शाम का समय था। मोहल्ले की वही पुरानी गली, जहाँ कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, आज अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।
रामलाल जी अपने घर के बाहर चारपाई पर बैठे थे। नजरें गली के उस मोड़ पर टिकी थीं, जहाँ कभी उनके बेटे और पड़ोस के बच्चे क्रिकेट खेलते थे। आज वहाँ सिर्फ धूल उड़ रही थी।
“कहाँ गए वो दिन…” उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा।
तभी उनके दोस्त श्यामलाल जी पास आकर बैठे। दोनों कुछ देर तक खामोश रहे, फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ।
“याद है, हमारे जमाने में 20-22 साल में ही शादी हो जाती थी,” श्यामलाल जी बोले, “घर में बच्चे, फिर उनके बच्चे… पूरा आंगन भरा रहता था।”
रामलाल जी ने सिर हिलाया, “अब तो 30-35 साल तक शादी ही नहीं होती। और जब होती है, तो एक बच्चा… या कभी-कभी वो भी नहीं।”
दोनों की बातें सिर्फ यादों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि बदलते समाज की सच्चाई बयां कर रही थीं।
गली के सामने वाला घर, जहाँ कभी चार भाई एक साथ रहते थे, अब बंद पड़ा था। शहर की ऊँची इमारतों में बसने वाले उन परिवारों ने पीछे मुड़कर देखना ही छोड़ दिया था। संयुक्त परिवार अब सिर्फ कहानियों में रह गए थे।
उधर, मोहल्ले की सीमा—जो कभी बच्चों से भरा रहता था—आज सुनसान थी।
लोग घरों से ज्यादा सड़कों पर दिखते थे, और घरों के अंदर… सिर्फ खामोशी।
“आज के बच्चे आजादी तो पा गए,” रामलाल जी बोले, “लेकिन शायद रिश्तों की अहमियत खो बैठे हैं।”
श्यामलाल जी ने धीमे से कहा, “अब तो बच्चे भी नहीं चाहते… कहते हैं जिम्मेदारी है।”
दोनों के चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी।
“अगर यही चलता रहा,” रामलाल जी ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “तो आने वाले समय में रिश्ते सिर्फ किताबों में मिलेंगे—चाचा, ताऊ, मामा… सब खत्म हो जाएंगे।”
हवा में एक अजीब सी बेचैनी थी।
यह सिर्फ दो बुजुर्गों की बातचीत नहीं थी, बल्कि एक पूरे समाज की कहानी थी—जहाँ करियर, भागदौड़ और व्यक्तिगत आजादी के बीच कहीं न कहीं परिवार और रिश्ते पीछे छूटते जा रहे हैं।
रात गहराने लगी थी। गली में अब पूरी तरह सन्नाटा था।
रामलाल जी उठे, दरवाजा बंद किया और अंदर चले गए।
लेकिन उनके मन में एक सवाल अब भी गूंज रहा था—
“क्या आने वाली पीढ़ियां इस खालीपन को समझ पाएंगी?”

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