जिसने हिटलर को भी झुका दिया, वही हैं भारत के सच्चे देशभक्त – हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद

मेजर ध्यानचंद साल 1956 में सेना से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाज़ा। भले ही आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारतीय हॉकी को ऊँचाई पर ले जाने में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। मेजर ध्यानचंद हर पीढ़ी के युवाओं और खिलाड़ियों के लिए सच्ची प्रेरणा हैं। उनके जन्मदिन 29 अगस्त को पूरा देश राष्ट्रीय खेल दिवस (National Sports Day) के रूप में मनाता है।

भारत को हॉकी के जरिए दुनिया में नई पहचान दिलाने वाले मेजर ध्यानचंद को खेल जगत ‘हॉकी का जादूगर’ कहकर सम्मानित करता है। गेंद उनकी स्टिक से इस तरह चिपक जाती थी जैसे उसमें कोई चुंबक लगा हो। विरोधी खिलाड़ी चाहकर भी उनसे बॉल छीन नहीं पाते थे। इसी करिश्माई खेल ने जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर तक को उनका मुरीद बना दिया था। हिटलर ने उन्हें जर्मन नागरिकता और अपनी सेना में कर्नल का पद देने की पेशकश की थी, लेकिन ध्यानचंद ने साफ शब्दों में इसे ठुकरा दिया और भारत के लिए खेलते रहने का फैसला किया।
29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में जन्मे ध्यानचंद की जयंती को पूरा देश राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाता है। 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में भारत ने लगातार तीन स्वर्ण पदक जीते, जिनमें ध्यानचंद की भूमिका सबसे अहम रही।

मेजर ध्यानचंद से जुड़ी खास बातें
- असली नाम ध्यान सिंह था, लेकिन रात में चांदनी के नीचे लगातार अभ्यास करने की वजह से साथियों ने उन्हें ‘ध्यानचंद’ नाम दिया।
- उन्होंने 16 साल की उम्र में ब्रिटिश भारतीय सेना जॉइन की और वहीं से हॉकी का सफर शुरू हुआ।
- 1928 एम्स्टर्डम ओलंपिक में उन्होंने 14 गोल दागे। स्थानीय अखबारों ने लिखा – “यह हॉकी नहीं, जादू है और ध्यानचंद जादूगर हैं।”
- नीदरलैंड्स में एक बार अधिकारियों ने उनकी हॉकी स्टिक तोड़कर यह जांच की थी कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं लगा।
- 1932 ओलंपिक फाइनल में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया। इसमें ध्यानचंद ने 8 और उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किए थे।
- 1936 बर्लिन ओलंपिक में उनके खेल ने जर्मनी को झुकने पर मजबूर कर दिया।
- उनके बेटे अशोक ध्यानचंद ने भी भारत का प्रतिनिधित्व किया और 1975 के हॉकी विश्व कप में गोल कर भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
- 1956 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।
- उनकी आत्मकथा ‘गोल’ आज भी हॉकी प्रेमियों के लिए प्रेरणा है।
- भारत सरकार ने 2021 में देश के सर्वोच्च खेल सम्मान ‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’ का नाम बदलकर ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ कर दिया।
खेलों के डॉन ब्रैडमैन और पेले के समकक्ष
जिस तरह क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन और फुटबॉल में पेले को माना जाता है, ठीक उसी तरह हॉकी में ध्यानचंद का नाम लिया जाता है। उनका खेल न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय तिरंगे को गौरवान्वित करने वाला रहा।



