सांप्रदायिकता के विरुद्ध खड़े होकर अमर हुए गणेश शंकर विद्यार्थी

इलाहाबाद की पावन धरा पर 26 अक्तूबर 1890 को अतरसुइया के एक साधारण कायस्थ परिवार में जब इस बालक का जन्म हुआ तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह शिशु भविष्य में भारतीय पत्रकारिता का सूर्य बनेगा।
समय टुडे डेस्क।
25 मार्च 1931 — इस दिन शहर की सड़कों पर ऐसा दर्दनाक मंजर देखने को मिला जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने सांप्रदायिक दंगों में फंसे निर्दोष लोगों को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। महज 40 वर्ष की उम्र में उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी केवल कलम से ही नहीं, बल्कि अपने प्राणों का बलिदान देकर भी देश की सेवा करता है।
25 मार्च को उनकी शहादत को देश में “बलिदान दिवस” के रूप में भी याद किया जाता है। यह दिन हमें उस महान आत्मा की याद दिलाता है, जिसने हिंदू-मुस्लिम एकता और मानवता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के अतरसुइया मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता शिव नारायण शुक्ल एक शिक्षक थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे कानपुर आए और यहीं से उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। वर्ष 1913 में उन्होंने ‘प्रताप’ साप्ताहिक का संपादन संभाला, जिसे बाद में दैनिक बनाया गया। ‘प्रताप’ अपने निर्भीक और ब्रिटिश विरोधी लेखों के लिए प्रसिद्ध हुआ।
उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का खुलकर विरोध किया और असहयोग आंदोलन व सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे केवल पत्रकार ही नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली राजनेता और समाजसेवी भी थे तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे।
उनकी पत्रकारिता निडर, निष्पक्ष और जनहितैषी थी। उन्होंने किसानों, मजदूरों और दलितों की आवाज को प्रमुखता से उठाया और समाज में फैल रही सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार लेख लिखे।
25 मार्च 1931 को, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी के बाद कानपुर में भड़के दंगों के बीच वे बिना किसी भय के मैदान में उतर गए। उन्होंने दोनों समुदायों के लोगों को बचाने का प्रयास किया—कहीं हिंदुओं को, तो कहीं मुसलमानों को। वे लगातार भीड़ से शांति की अपील करते रहे, लेकिन उन्मादी भीड़ ने उनकी बात नहीं सुनी।
अंततः दंगाइयों ने उन्हें घेरकर निर्ममता से मार डाला। कुछ दिनों बाद उनका शव अज्ञात लाशों के बीच मिला, जिसकी स्थिति अमानवीय क्रूरता की गवाही दे रही थी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी उन्हें “देश का गौरव” बताया था।
आज जब समाज में सांप्रदायिक सौहार्द की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति मानवता, एकता और करुणा में निहित है। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

इस अवसर पर कवि मुकुल सरल की चर्चित कविता ‘साथ हो न!’ का यह अंश उनके विचारों और आज के समय की सच्चाई को बखूबी दर्शाता है—
**“एक क़लम था मेरा
और एक था तुम्हारा
फावड़े सा, बेलचे सा, हल सरीख़ा
रस्ते-रस्ते सब्ज़ा बोता
रौशनी के पुल बनाता
लांघता सारी दिशाएं
नेह का मेह बन बरसता
सींचता मन मरुथलों को
प्यार की देता सदाएं
और ज़रूरत पड़ गई तलवार के भी काम आता
वह क़लम अब खो गया है
छिन गया, गिरवी पड़ा है
दुश्मनों के हाथ में है
बन गया है टैंक मानवद्रोहियों का
रौंदता फिरता है जल-जंगल-ज़मीनें
रच रहा संविधान की कुछ नयी ऋचाएं
हुक्मनामे और सज़ाएं
और ऐसे दौर में भी
मानवद्रोहियों के साथ दिखते
हाट में बिकते
हमारे कुछ कवि, लेखक, सहाफ़ी
गा रहे जयगान
आवाज़ें बदलकर
रच रहे हैं शब्द
नये शब्दकोश
ध्वस्त करके बोल-बोली
काटकर जन की ज़बां
रच रहे भाषा संहिता
बुन रहे हैं मौन
चुप्पी का अंधेरा
चक्रव्यू एक
है समय कितना विकट !
…
मैं निहत्था, बेक़लम
लेकिन अभी बाज़ू बराबर
उंगलियों में भी है जुंबिश
और रगों में दौड़ता है रौशनाई सा लहू
और फिर तुम साथ हो तो
क्या कमी है
साथ हो न…!”**



