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20 अक्टूबर 2025 को मनाई जायेगी दीवाली !

र्म सिन्धु, निर्णय सिन्धु प्रसिद्ध ग्रन्थों के अनुसार, दीवाली के त्योहार पर अमावस्या तिथि व प्रदोष काल के संयोग का होना आवश्यक है। हिन्दू धर्म में सभी पर्व व त्योहार सूर्योदय के समय तिथि के उदय काल से निर्धारित किये जाते हैं क्युंकि पंचांग में भी दिन के परिवर्तन का प्रतिनिधित्व सूर्य देव ही करते हैं। सूर्योदय के समय जो तिथि उदित रहती है वही तिथि पूरे दिन प्रभावी मानी जाती है। इस नियम का पालन दैनिक जीवन में व्रत,पर्व व त्योहारों का निर्धारण करने के लिए किया जाता है। यदि सूर्योदय के समय पर दशमी तिथि है और सुबह 11 बजे एकादशी तिथि का आगमन हो रहा है तो उस दिन दशमी तिथि ही मान्य रहेगी और एकादशी का व्रत अगले दिन रखा जायेगा।

•लेकिन इस नियम के कुछ विशेष अवसरों पर अपवाद भी निर्धारित किये गये हैं— हिन्दू सनातन संस्कृति में सूर्य एवं चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार ही पर्व, त्योहार, व्रत आदि का निर्धारण करने का विधान है। कुछ विशेष व्रत व त्योहारों पर सूर्योदय कालीन तिथि का महत्व ना होकर “काल व्यापिनी तिथि” (वह तिथि जो लम्बे समय तक रहती है) का महत्व अधिक माना गया है। यह महत्व उन व्रत व त्योहारों में मान्य होता है जिनमें चन्द्रमा के दर्शन करना अनिवार्य हो, जैसे करवा चौथ व्रत, सकट चौथ व्रत,अहोई अष्टमी व्रत। इन व्रत की तिथियों में चन्द्रमा प्रवेश कर रहा है या नहीं, यह विशेष रूप से देखना चाहिए। कुछ त्योहारों में उदया तिथि को महत्व दिया जाता है, तो कुछ त्योहारों में मध्य व्यापिनी (दोपहर), प्रदोष व्यापिनी (शाम) और निशीथ व्यापिनी (रात्रि काल) को महत्व दिया जाता है। हिन्दू धर्म के व्रत, पर्व व त्योहारों के निर्णय के संदर्भ में सूर्य व चन्द्रमा की महत्ता को समझा जाये और सटीक गणना को महत्व दिया जाये, तो प्रत्येक त्योहार को सिर्फ उदया तिथि के अनुसार नहीं मनाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर दशहरा प्रदोष व्यापिनी तिथि के अनुसार यानी दोपहर में मनाया जाता है। श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी में मध्य रात्रि में हुआ था, तो रात्रि में अष्टमी तिथि होने पर यानी निशीथ व्यापिनी में सभी लोग व्रत का परायण करते हैं। ऐसे ही प्रभु श्रीराम का जन्म चैत्र मास शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि में दोपहर में हुआ था। तो उनका जन्मोत्सव जिस दिन मध्य व्यापिनी यानी दोपहर के समय नवमी तिथि हो तभी मनाया जाता है। इसी प्रकार से दीवाली एक ऐसा त्योहार है जो अमावस्या तिथि की संध्या काल में ही मनाया जाता है। अमावस्या तिथि में ही माँ लक्ष्मी का प्रकाट्य हुआ था, इसलिये माँ लक्ष्मी रात्रि में ही विचरण करती हैं।

•मुहूर्त शास्त्रानुसार दीवाली के अवसर पर क्या सटीक योग होने चाहिए— इस दिन अमावस्या तिथि, प्रदोष काल एवं निशिथा काल का योग होना आवश्यक है। इस दिन उदया तिथि का नियम लागू नहीं होता है। यदि सूर्योदय के समय पर अमावस्या तिथि का उदय नहीं भी हुआ है और अमावस्या तिथि दिन के मध्य भाग में प्रवेश कर रही है, साथ ही प्रदोष व निशिथा काल भी स्पर्श हो रहा है, तो दीवाली का त्योहार उसी दिन मनाया जायेगा। क्युंकि, माँ लक्ष्मी की पूजा सन्ध्या के समय प्रदोष काल एवं रात्रि के समय निशिथा काल में ही की जाती है। यदि कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि में उपरोक्त लिखित यह सभी अनिवार्य नियम एक साथ स्पर्श कर रहे हैं तो दीवाली का त्योहार निसंकोच उसी दिन मनाया जाता है।

•दीवाली का शुभ मुहूर्त— इस वर्ष कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर 2025 में दोपहर 03 बजकर 45 मिनट पर आगमन कर रही है जो अगले दिन 21 अक्टूबर 2025 शाम 05 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। इस लिहाज़ से दीवाली का त्योहार 20 अक्तूबर 2025, सोमवार को ही मनाया जायेगा। 20 अक्टूबर 2025 सोमवार को दीवाली पूजन का शुभ मुहूर्त प्रदोष काल में शाम 05:46 से शुरु होकर रात्रि 08:18 बजे तक रहेगा। इसके बाद दूसरा सबसे शुभ मुहूर्त शाम 07:08 से शुरु होकर रात्रि 09 बजे तक रहेगा। इस मुहूर्त में प्रदोष काल एवं स्थिर वृषभ लग्न दोनों की शुभता प्राप्त हो रही है जो ज्योतिषीय आधार पर अत्यंत मंगलकारी मुहूर्त है। स्थिर लग्न में माँ लक्ष्मी की पूजा करने से घर और व्यापार में उन्नती, धन, सुख, संपन्नता का स्थायी वास रहता है। इस मुहूर्त में गृहस्थ एवं व्यापारी वर्ग दीवाली पूजन कर सकते हैं। निशिथा काल में पूजन का शुभ मुहूर्त देर रात्रि 11:41 से शुरु होकर मध्य रात्रि 12:31 तक है और 01:43 से 03:55 तक सिंह स्थिर लग्न में शुभ मुहूर्त है। सिंह लग्न जब होता है तो उस समय घनघोर अँधेरा होता है और उस समय अमावस्या तिथि यानी सोने पे सुहागा। यह समय माँ की साधना करने वाले साधकों, तंत्र शास्त्र में सिद्धि प्राप्त करने के लिये उत्तम माना गया है। दीवाली पर लक्ष्मी गणेश,सरस्वती,कुबेर, श्रीयंत्र और माँ काली की पूजा की जाती है। यदि आपके घर में श्रीयंत्र स्थापित नहीं हुआ है तो दीवाली पर पारद या स्फटिक के श्रीयंत्र पूजन में रखकर स्थापित करें।

•दीवाली के लिये जरूरी पूजन सामग्री– घी, पान, लौंग, बताशे, सुपारी, जनेऊ, नारियल,पंच मेवा,पंचमेल मिष्ठान, फूल माला, रोली, चौकी,लाल कपड़ा, गंगाजल,गौ दूध,कलावा,चांदी का सिक्का, तांबे या मिट्टी का कलश,आम के पत्ते, सप्तमात्रिका, कमल का फूल,ग्यारह कमल गट्टे, धान का लावा या खील आदि से पूजन करें। दीवाली पर 24 मिट्टी के दीपक तिल या सरसो के तेल के घर में जलाएं, लक्ष्मी जी के पास सरसो के तेल का दीपक पूरी रात जलाकर रखें।

•धनतेरस और नरक चतुर्दशी कब मनाएँ– 18 अक्टूबर को धनतेरस और नरक चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025 को मनाई जायेगी। 21 अक्टूबर को गोवर्धन और 22 अक्टूबर को भाई दूज का त्योहार मनाया जायेगा। धनतेरस पर 5 सरसो के तेल के दीपक जलाएं और नरक चतुर्दशी पर 14 दीपक सरसो के तेल के और एक दीपक घर की दक्षिण दिशा में यम के लिये जलाएं। भाई दूज पर बहनें अपने भाईयों की दीर्घायु के लिए स्वयं भोजन बनायें।

नोट: स्थानीय मान्यताओं, रीति-रिवाजों के अनुसार भेद सम्भव है।

ज्योतिर्विद् अशनिका शर्मा
मेरठ, उत्तर प्रदेश।

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