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कम उम्र में शादी का मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर, जागरूकता और संवाद जरूरी

विवाह से पहले भावनात्मक तैयारी, शिक्षा और करियर को मिले पर्याप्त अवसर

लेखक: डॉ. मनोज कुमार तिवारी
वरिष्ठ परामर्शदाता, एआरटीसी, एस.एस. हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी

भारत में विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्कार और परिवार निर्माण की आधारभूत प्रक्रिया है। हालांकि, विवाह के लिए निर्धारित न्यूनतम आयु का पालन करने के साथ यह भी जरूरी है कि व्यक्ति मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से विवाह की जिम्मेदारियों के लिए तैयार हो। कम उम्र में विवाह का दबाव कई बार तनाव, चिंता, अवसाद, आत्मविश्वास में कमी और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।

कम उम्र में विवाह से मानसिक स्वास्थ्य पर क्यों पड़ता है असर?

भावनात्मक अपरिपक्वता: किशोरावस्था स्वयं को समझने, सीखने और भविष्य की दिशा तय करने का समय होता है। इस दौरान विवाह होने पर अचानक गृहस्थी और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ सकता है।

घरेलू हिंसा और असुरक्षा: कम उम्र में विवाह करने वाली लड़कियों में शारीरिक एवं मानसिक हिंसा का जोखिम बढ़ सकता है। लगातार डर, दबाव और नियंत्रण की स्थिति मानसिक आघात का कारण बन सकती है।

शिक्षा और करियर प्रभावित होना: विवाह के बाद पढ़ाई रुकने से शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं। आर्थिक निर्भरता आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकती है।

अकेलापन और सामाजिक अलगाव: शिक्षा और करियर के अवसर छूटने तथा नई जिम्मेदारियों के कारण सामाजिक दायरा सीमित हो सकता है, जिससे अकेलेपन और तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।

अनचाहा गर्भ और जिम्मेदारियों का दबाव: शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार न होने पर गर्भधारण और बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी तनाव को बढ़ा सकती है।

तनाव और आत्मसम्मान पर भी असर

कम उम्र में विवाह होने पर कई युवाओं को अपने व्यक्तिगत सपनों और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई होती है। अपनी इच्छा के विरुद्ध निर्णय लेने का दबाव व्यक्ति को शक्तिहीन और असंतुष्ट महसूस करा सकता है।

वहीं, विवाह को जीवन की सफलता का अनिवार्य मानक मानने वाली सामाजिक सोच भी युवाओं पर अतिरिक्त दबाव डालती है। इससे आत्मसम्मान में कमी और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

रिश्तों में भावनात्मक तनाव

जल्दबाजी में किए गए विवाह में कई बार दोनों साथी भावनात्मक रूप से जिम्मेदारियों के लिए तैयार नहीं होते। ऐसी स्थिति में आपसी मतभेद, तनाव और पारिवारिक संघर्ष बढ़ सकते हैं।

क्या हो सकते हैं समाधान?

खुलकर संवाद करें: युवाओं को अपनी आकांक्षाओं, चिंताओं और भविष्य की योजनाओं के बारे में परिवार से खुलकर बात करनी चाहिए। माता-पिता को भी बच्चों की भावनाओं और इच्छाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए।

भावनात्मक मजबूती विकसित करें: ध्यान, योग, डायरी लेखन और स्वस्थ दिनचर्या जैसी गतिविधियां तनाव से निपटने में मदद कर सकती हैं।

शिक्षा और कौशल विकास जारी रखें: शिक्षा व्यक्ति के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को मजबूत करती है। विवाह से पहले युवाओं को अपनी शिक्षा और करियर को पर्याप्त समय देने का अवसर मिलना चाहिए।

मजबूत सपोर्ट सिस्टम बनाएं: अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय भरोसेमंद मित्र, परिवार के सदस्य या किसी पेशेवर से बातचीत करना उपयोगी हो सकता है।

जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लें: अत्यधिक तनाव, चिंता, लगातार उदासी या अवसाद जैसी स्थिति महसूस होने पर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लेना उचित है।

माता-पिता और समाज की भी जिम्मेदारी

युवाओं पर विवाह का अनावश्यक दबाव डालने के बजाय उन्हें अपनी शिक्षा, कौशल और पसंद के करियर को आगे बढ़ाने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए। विवाह को सामाजिक दबाव या सफलता का एकमात्र पैमाना मानने के बजाय इसे जीवन का महत्वपूर्ण लेकिन व्यक्तिगत निर्णय समझना आवश्यक है।

डॉ. मनोज कुमार तिवारी के अनुसार, सही समय पर विवाह के साथ युवाओं की मानसिक तैयारी, शिक्षा, करियर और व्यक्तिगत इच्छाओं का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वस्थ संवाद और सहयोग से विवाह से जुड़े मानसिक दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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