बरेली के बौरिया गांव से शुरू हुई शिक्षिका राखी गंगवार की ‘पैड बैंक’ पहल अब 85 से अधिक गांवों तक पहुंच चुकी है। किशोरियों को सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने के साथ वह मासिक धर्म को लेकर जागरूकता और झिझक दूर करने का काम भी कर रही हैं।
- अमित कुमार
बरेली। बौरिया गांव के प्राथमिक विद्यालय में एक दिन शिक्षिका राखी गंगवार बच्चों को गणित पढ़ा रही थीं। इसी दौरान उनकी नजर कक्षा की सबसे होनहार छात्राओं में शामिल लाडो की खाली बेंच पर गई। लाडो लगातार तीन दिनों से स्कूल नहीं आई थी।
लाडो की गैरहाजिरी ने राखी को चिंतित कर दिया। स्कूल की छुट्टी के बाद उन्होंने अपनी स्कूटी उठाई और गांव की गलियों से होते हुए लाडो के घर पहुंच गईं।
घर पहुंचने पर राखी ने लाडो की मां से उसके स्कूल नहीं आने की वजह पूछी। बातचीत में सामने आया कि मासिक धर्म के दौरान लाडो को घर से बाहर भेजने में परिवार को झिझक होती थी। आर्थिक परेशानी के कारण परिवार सैनिटरी पैड भी नहीं खरीद पाता था।
लाडो को पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करना पड़ता था। इस वजह से वह स्कूल जाने के बजाय घर में रहने को मजबूर थी। राखी ने जब लाडो को उदास देखा तो उन्होंने इस समस्या को गंभीरता से लिया।
राखी ने तय किया कि उनकी कक्षा की किसी भी छात्रा की पढ़ाई मासिक धर्म से जुड़ी झिझक या स्वच्छता सामग्री की कमी के कारण प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
अगले ही दिन उन्होंने स्कूल के एक कोने में छोटी सी अलमारी रखी और अपनी जेब से सैनिटरी पैड खरीदकर उसमें रख दिए। इस पहल को नाम दिया गया—‘हमारी किशोरी, हमारी शक्ति: पैड बैंक’।
शुरुआत में छात्राएं पैड बैंक का इस्तेमाल करने में झिझकती थीं। गांव के कुछ लोगों ने भी इस पहल को लेकर सवाल उठाए। इसके बावजूद राखी ने जागरूकता अभियान जारी रखा।
उन्होंने कहानियों, गतिविधियों और संवाद के जरिए छात्राओं को मासिक धर्म और स्वच्छता के बारे में समझाना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चियों का संकोच कम होने लगा और वे अपनी समस्याओं पर खुलकर बात करने लगीं।
राखी ने छात्राओं को बताया कि मासिक धर्म एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है और इसे लेकर शर्म महसूस करने की जरूरत नहीं है। इस जागरूकता का असर भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगा।
लाडो उन शुरुआती छात्राओं में शामिल रही, जिसने पैड बैंक से सैनिटरी पैड लिया। इसके बाद उसका स्कूल आना फिर से शुरू हुआ और वह पहले की तरह पढ़ाई करने लगी।
बौरिया के स्कूल से शुरू हुई यह छोटी-सी पहल धीरे-धीरे आसपास के गांवों तक पहुंचने लगी। राखी की मुहिम अब बरेली के 85 से अधिक गांवों तक पहुंचने का दावा करती है।
इस अभियान के जरिए किशोरियों और महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता, सैनिटरी पैड के इस्तेमाल और इससे जुड़ी सामाजिक झिझक के बारे में जागरूक किया जा रहा है।
आज ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और बच्चियां राखी गंगवार को प्यार से ‘पैड वुमन’ कहकर बुलाती हैं। एक शिक्षिका की छोटी-सी पहल अब ग्रामीण किशोरियों के बीच जागरूकता और स्वच्छता की मुहिम का रूप ले चुकी है।


