जाति- वाद एक मानसिकता को दर्शाता है ……..

जाति- वाद एक मानसिकता को दर्शाता है ……..
वह मनुष्य अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुआ है या था।
यहाँ स्त्री पुरुष का भी नजरिया देखा जाता है।
अगर किसी भी परिवार में स्त्री हो या पुरुष जाति-वाद के भेदभाव बाले परिवार से आया है !
अगर उसने किसी कारण उस वक्त यह न समझ कर लव मैरिज की है तो शादी के बाद उसे यह प्रताड़ना झेलनी पड़ती है।
छोटी जाते के होने से बड़े जाति बाले परिवार में ।
यह भी एक अब्यूज़ ( हिंसा )
इस लिये ज्यादातर लोग जाति के भेदभाव से ग्रसित होते हैं और लव मैरिज नहीं होने देते कभी कभी तो लोग लव मैरिज करने के बाद में पति या पत्नी जो पिछड़ी जाति से हो उसे आपस में ही नीचा दिखाना शुरू कर देते हैं यह इस कारण से है कि लोग अपने परिवार या सोसाइटी ,समाज के दबाव में आकर भी करते हैं।
यह एक प्रकार की हिंसा है जो मनुष्य होने की श्रेणी में नहीं आती मानवाधिकार के लिये कानून ने इतना कुछ बदला है पर आज भी यह कमतर सोच को नहीं बदल पाये ।
इस तरह की मानसिकता को दहेज़ लेने या किसी भी कुप्रथा से भी जोड़ा जाता हैं।
यह पितृसत्तात्मक सोच ही नहीं हावी होती यहाँ स्त्रीसत्तात्मक सोच भी हावी होती है।
जहां एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी होती है ।
ज्यादातर देखा होगा की स्त्री को कमतर करने के लिये स्त्री ही स्त्री का शोषण करना शुरू कर देती है ।
यह सोच उसमें होती नहीं न स्त्री में न पुरुष में यह परिवार के बड़े लोग ही या कमतर सोच कर बीच बैठक से उत्पन्न होती है।
इस तरह के बहुत से अपराध हैं जो मनुष्य अपने को बड़ा दिखाना चाहते हैं या थे ।
यह मानसिकता तभी बदली जा सकती है जब व्यक्ति स्वयं बदलना चाहेगा ..
अपने परिवार में भी और अपने संतान को माता पिता यह बात न सिखाकर इसके बारे में समझाएं और जब छोटे बच्चों के बीच यह बात न होगी न सिखाई जायेगी तो यह
दहेज़ प्रथा जाति प्रथा विधवा प्रथा संतान उत्पन्न न होने वाली बांझ प्रथा का जब तक विरोध नहीं होगा तब तक यह प्रथा चलती रहेंगी ।
इन प्रथाओं में ज्यादातर स्त्री के शोषण की प्रथाएँ है ।
जो मनुष्य ज्यादातर पुरुष प्रधान समाज जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते वह इन प्रथाओं का सहयोग करते हैं।
जैसे स्त्री को अपने वश में रखना या उसे समाज की नजरों में नीचा दिखाना अगर स्त्री अपने हक की बात करती है अपने परिवारिक और शारीरिक अधिकार मांगती है तो उसे चरित्र से कमज़ोर बताया जाता है या पुरुष के गलत होने पर आवाज़ उठाती है या पुरुष में कमी हो शारीरिक तो उसे या तो चरित्र से कमज़ोर किया जाता है या अपने कविल नहीं होने का दर्जा दिया जाता है या भक्ति में लीन होने को स्थापित कर दिया जाता है या पुरुष बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं है तो स्त्री को बांझ करार दिया जाता है और स्वयं को बचा लेता है पति की मृत्यु के बाद स्त्री को विधवा का चोला देकर चाला जाता है।
सारे जीवन स्त्री अकेली मरती है जब की जीवन उसका तो बचा है वह तो सांसे ले रही है वह जिंदा है उसे भी विवाह कर लेना चाहिए यह निर्णय उसके ऊपर है वह ऐसा चाहती है या नहीं इसी तरह जैसे पुरुष को यह निर्णय लेने का हक दिया जाता है।
पुरुष पत्नी न रहने पर स्वयं को विवाह में बांध लेता है
हर तरफ से स्त्री को कमतर कर पुरुष प्रधान समाज स्त्री को ही नीचा दिखाता है ।
यह कमतर सोच विचार को बदलना जरुरी है।
हर कुप्रथा को रोकने के लिये ।
जब तक नये नजरिया नये विचार नयी सोच नहीं होगी तब तक ऐसा ही चलता रहेगा ।
यह बदलाव जरुरी है अपने जीवन और विकासशील देश के लिये ।
यह मनुष्य द्वारा ही होगा क्योंकि वह सक्षम है यह सब करने में स्त्री को भी बदलाव लाने होंगे स्त्री के पक्ष में केवल स्त्री लेखन करने से आप स्त्री पक्षधर नहीं हो जाती स्त्री के साथ खड़े होने से आप स्त्री लेखन का सम्मान प्राप्त कर पायेगीं गलत को गलत सही को सही करना जरुरी है।

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