“बड़े भाग मानुष तन पावा “
जीवन की उलझनों के बीच स्वयं को समय दे पाना किसी चुनौती से कम नहीं है, अपनी छोटी छोटी इच्छाओं को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ जाना और फिर पलट कर बीते हुए समय को देखना की “काश हमनें वो कर लिया होता ” तब समय था।
ये मलाल आगे जाकर घुटन पैदा करता है,बढ़ती उम्र के साथ जब शरीर शिथिल होने लगता है तब कुछ बातें या इच्छाएं जो जीवन की दौड़ में पीछे छूट गई थीं वो मन के किसी कोने में आंदोलित होने लगती हैं, और तब ये विचार करना कि “काश जी लिया होता उस लम्हे को ” बिल्कुल व्यर्थ है, एक बात हमेशा याद रखिये ईश्वर ने हमें बहुत योग्य समझकर ये मानव तन दिया है इसका एक एक क्षण सही प्रयोग करना ज़रूरी है।
यदि आप ये सोच लेकर बैठे हैं कि ” आज नहीं कल कर लेंगे अभी तो बहुत समय है हमारे पास ” तो इस भ्रम से जितना जल्दी हो सके बाहर आ जाइए, सुनने में थोड़ा कटु लगेगा लेकिन सच तो ये है कि इस नश्वर संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है, न ये जीवन और न समय।
आपके पास उतना ही समय है जितना आप जी चुके या जिस वर्तमान को आप जी रहे हैं, मैं ये नहीं कहती कि भविष्य की चिंता को दरकिनार कर दिया जाए, बिल्कुल भी नहीं ये पूरी दुनिया ही भविष्य की आस में जीवित है चलायमान है, किन्तु वर्तमान को जीना भी उतना ही ज़रूरी है जितना की भविष्य के संरक्षण की चिंता।
अभी छोटी इच्छाओं को पूरा करते रहिये,आज को ऐसे जी लीजिये जैसे कल है ही नहीं।
स्वयं को भी समय दीजिये, अपने शौक अपने हुनर और अपने रिश्तों को भी समय दीजिये, ये आपकी ज़िम्मेदारी है, ईश्वर के दिये इस अनमोल उपहार (जीवन) का आदर कीजिये, आपमें सब कुछ करने की क्षमता है बस आवश्यकता है स्वयं के भीतर झाँकने की, स्वयं को पहचानने की,खुश रहने के लिए किसी विशेष परिस्थिति या साल या समय या त्यौहार या व्यक्ति विशेष का रास्ता मत देखिये, जहाँ आप हैं वहीं खुशी है।
इसलिए जीना शुरुआत कीजिये क्योंकि ज़िन्दगी को ढ़ोते हुए आप थक चुके होंगे।

~ प्राची मिश्रा ( बैंगलोर )


