मंच को नमन
है लज़्ज़ा शील भूषण ,नारी की आत्मा का
क्यो तार तार कियातुमने, आँचल मानवता का।
कायर हो तुम नारी पे ,बस इतना चला पाए,,
नग्न सरेआम किया, बस नपुंसकता दिखा पाये ।
बस है यही हथियार ,क्या पास में तुम्हारे,,
कुछ और ना कर पाए, तो वस्त्र थे उतारे।
जो है घिनोने चेहरे, वो छुपते ना छुपाते, ,
दृष्टि उसी की नीची क्यों, जिसकी अस्मत के चिथड़े हो जाते।
दुनिया भी तमाशबीन है, ऐसी सदा रहेगी
नारी तेरी ये कहानी, खून के आँसू ही पियेगी
क्यों पूजते हो दुर्गा, माँ कली भवानी को,
अधिकार नहीं उसको जो समान ना दे नारी को
पर तुम सर नहीं झुकाना, क्या जुर्म है तुम्हारा,
सर काट दो वहशी के, जो समझे ना मर्म तुम्हारा।
मै भी क्या खूब अपना फर्ज,अदा कर रही हूँ,
बंद कमरे में बैठ बस कलम चला रही हूँ।

~ नीतू गर्ग
नोएडा


