सरकारी नौकरी से दलित आंदोलन के शिखर तक: कांशीराम की जीवन यात्रा

- समय टुडे डेस्क
बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संस्थापक और दलित आंदोलन के प्रमुख चेहरा कांशीराम की पुण्यतिथि पर आज पूरा देश उन्हें नमन कर रहा है। पंजाब के रूपनगर में जन्मे कांशीराम ने अपना जीवन दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के उत्थान को समर्पित किया। उन्होंने न केवल बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की विचारधारा को आगे बढ़ाया, बल्कि उसे राजनीतिक धरातल पर स्थापित भी किया।
सरकारी नौकरी से मिली प्रेरणा
कांशीराम का राजनीतिक सफर सरकारी नौकरी से शुरू हुआ। 1958 में वे पुणे स्थित डीआरडीओ में लैब असिस्टेंट के पद पर कार्यरत थे। इसी दौरान उनके विभाग में ज्योतिबा फुले की जयंती पर मिलने वाली छुट्टी रद्द कर दी गई। उन्होंने दलित कर्मचारियों को संगठित किया और प्रबंधन के फैसले का विरोध किया। आंदोलन के दबाव में छुट्टी बहाल कर दी गई। यह घटना कांशीराम के जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई — यहीं से उन्होंने दलितों को संगठित करने का संकल्प लिया।
बाद में उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर की प्रसिद्ध पुस्तक “एनिहिलेशन ऑफ कास्ट” पढ़ी, जिसने उनके विचारों को नई दिशा दी। 1964 तक वे पूरी तरह से सामाजिक कार्यकर्ता बन गए और दलितों की जातीय पहचान की वकालत करने लगे।
बामसेफ से बीएसपी तक का सफर
दलित और पिछड़े वर्ग के शिक्षित कर्मचारियों को संगठित करने के लिए कांशीराम ने 6 दिसंबर 1973 को ऑल इंडिया बैकवर्ड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉइज फेडरेशन (BAMCEF) की स्थापना की।
14 अप्रैल 1978 को बाबा साहेब की जयंती पर वोट क्लब, दिल्ली में आयोजित बामसेफ की पहली रैली में उमड़े जनसैलाब ने देश की राजनीति को झकझोर दिया।
इसके बाद 1981 में उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS-4) बनाई और नारा दिया —
“ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़ — बाकी सब हैं DS-4”
यही संगठन आगे चलकर बहुजन समाज पार्टी (BSP) में तब्दील हुआ। 1984 में बीएसपी की स्थापना के साथ कांशीराम ने दलित राजनीति को राष्ट्रीय मंच दिया।
राजनीतिक संघर्ष और उपलब्धियां
कांशीराम ने सबसे पहले इलाहाबाद से विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ उपचुनाव लड़ा, हालांकि वे हार गए। लेकिन 1991 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में उन्होंने इटावा से जीत दर्ज कर लोकसभा पहुंचे। 1996 में उन्होंने होशियारपुर (पंजाब) से दोबारा जीत हासिल की।
2001 में उन्होंने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और राजनीति से सक्रिय रूप से संन्यास ले लिया।
दलित राजनीति के मसीहा
कांशीराम ने उत्तर भारत की राजनीति में “गैर-ब्राह्मणवाद” की नई शब्दावली दी। उनका कहना था —
“अंबेडकर किताबें इकट्ठा करते थे, मैं लोग इकट्ठा करता हूं।”
उन्होंने दिखाया कि सामाजिक न्याय के लिए गिड़गिड़ाने से नहीं, संघर्ष करने से अधिकार मिलते हैं। बीएसपी ने बहुत कम समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक सशक्त पहचान बनाई।
विरासत जो आज भी जीवित है
2006 में कांशीराम का निधन हो गया, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत आज भी जीवित है। मायावती ने उनके मार्गदर्शन में बीएसपी को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। हालांकि समय के साथ पार्टी की दिशा पर बहस होती रही, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि कांशीराम ने दलित राजनीति को भारत के लोकतांत्रिक ढांचे का अभिन्न हिस्सा बना दिया।
सरल जीवन, ऊंचे विचार
कांशीराम का जीवन सादगी और समर्पण का प्रतीक था। वे मानते थे कि “दलित सशक्तिकरण केवल शब्दों से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के प्रदर्शन से संभव है।”
आज जब देश सामाजिक समानता की बात करता है, तो कांशीराम का नाम स्वाभाविक रूप से स्मरण में आता है — एक ऐसे नेता के रूप में, जिन्होंने हाशिए पर खड़े लोगों को आवाज दी और उन्हें सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया।



