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लघुकथा-अफ़ेयर

ग्यारवीं कक्षा, जब से शरीर ने यौवन की प्रत्यंचा संभाली मनीषा के जीवन में आशीष आ गया। पहली नज़र का प्रेम जो बढ़ता ही गया। दोनों ने एक दूसरे को देख,फिर किसी को न देखा।स्कूल से निकल कर कॉलेज शुरू हो गया मगर गहनता बढ़ती ही रही।चिंगारी, आग बन चुकी थी तो खबर उड़ते- उड़ते घरवालों तक भी पहुंच गई।दोनों में जातिभेद तो न था लेकिन आर्थिक स्तर में जमीन -आसमान का अंतर था।मनीषा के पिता आयकर अधिकारी थे और आशीष के साधारण क्लर्क। खैर, इससे उन दोनों को कोई सरोकार न था।उम्र बढ़ने के साथ,अब भविष्य के सपने बुने जा रहे थे।घण्टों का साथ,मंदिर की अरदास और लगातार चलने वाली लैंडलाइन फोन की बातें। किसी सामाजिक मुहर के बगैर,वे एक दूसरे के जन्म- जन्मांतर के साथी थे।

पढ़ाई पूरी हुई।आशीष का बिज़नेस जमाने का प्रयास और हताशा,इधर मनीषा के विवाह का जोर जतन।तीन वर्षों बाद मनीषा के पिता ने एलान कर दिया,मेरे रहते उन कंगलों के घर नहीं ब्याहूँगा। जैसा ठीक समझें,कह कर मनीषा ने मौन धारण कर लिया।फिल्मों की तरह असली जिंदगी में हर बार दिलवाले दुल्हनियां नहीं ले जाते।

आज शादी हो गयी,अन्यत्र..समस्त धूमधाम और खर्चे खराबे के साथ।विदा के बाद मुँह दिखाई और फिर पहली रात्रि।सहज होते ही आई ए एस पति का पहला प्रश्न आया,आप इतनी सुंदर हैं कोई क्रश या अफ़ेयर तो रहा होगा?जी नहीं ,कह कर मनीषा ने आँखें मूँद लीं…मन का संवाद जारी था…

वो जो जीवन था,प्राण था,उत्साह था,समर्पण था,अतिरेक था उसको सिर्फ अफ़ेयर कह के उसकी गरिमा नहीं कम कर सकती।वो मेरा है,मुझ तक ही रहेगा,आखिरी साँस तक।

~ प्रीति त्रिपाठी

नई दिल्ली

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