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लट्ठमार की धमक और गंगा आरती की आभा के साथ ‘बिठूर महोत्सव’ का भव्य समापन

विधायक बिठूर अभिजीत सिंह सांगा ने महोत्सव को प्रोत्साहन देने के लिए विधानसभा अध्यक्ष की सराहना करते हुए कहा कि बिठूर के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

  • ज्योति सिंह

कानपुर नगर। तीन दिवसीय बिठूर महोत्सव का अंतिम दिन लोक संस्कृति, शास्त्रीय परंपरा और आस्था के अद्भुत संगम का साक्षी बना। दिनभर ब्रज, बुंदेलखंड और पंजाब की लोक प्रस्तुतियों ने माहौल को उत्सवमय बनाए रखा, जबकि शाम को पत्थर घाट पर संपन्न भव्य गंगा आरती ने आयोजन को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने पत्थर घाट पहुंचकर वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच मां गंगा की आरती में सहभागिता की और पूजन किया। अपने संबोधन में उन्होंने बिठूर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को नमन करते हुए कहा कि यह पावन धरती आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है और महोत्सव में “विविधता में एकता” का सुंदर स्वरूप देखने को मिला। इस अवसर पर उन्होंने विभिन्न कलाकारों को सम्मानित भी किया।

कार्यक्रमों की श्रृंखला में गिरराज ब्रज लोक कला संस्थान के कलाकारों ने दीपक शर्मा के नेतृत्व में ब्रज की पारंपरिक होली का मनमोहक मंचन किया। राधा-कृष्ण और गोपियों संग फूलों की होली ने फाल्गुनी उल्लास को जीवंत कर दिया। रंगों की उड़ान, पारंपरिक वेशभूषा और लोकगीतों की मधुर धुनों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रस्तुति में बरसाने की लट्ठमार होली, मयूर नृत्य और चरकुला नृत्य विशेष आकर्षण रहे।

इसके बाद रमेश पाल की टीम ने बुंदेलखंड का प्रसिद्ध पाई-डंडा नृत्य प्रस्तुत कर वीरता और सामूहिक तालमेल का प्रभावी प्रदर्शन किया। ढोल की गूंजती थाप और तीव्र लय ने दर्शकों से खूब तालियां बटोरीं।

पंजाब की परंपरा को मंच पर जीवंत करते हुए रुपिंदर सिंह एवं उनकी टीम ने मार्शल आर्ट ‘गतका’ का रोमांचक प्रदर्शन किया। तलवार और लाठी के सधे संचालन के साथ साहसिक करतबों ने कार्यक्रम में जोश भर दिया। आंख में नमक डालकर पट्टी बांधने और बर्फ की सिल्ली व नारियल पर आधारित प्रदर्शन ने विशेष रोमांच पैदा किया।

शास्त्रीय प्रस्तुतियों में हरिहरपुर घराने के मोहन मिश्रा के गायन ने श्रोताओं को भाव-विभोर किया। वहीं श्वेता वर्मा और उनकी टीम ने सधी हुई कत्थक प्रस्तुति से कार्यक्रम को कलात्मक गरिमा प्रदान की। घुंघरुओं की लय और प्रभावी भावाभिनय ने दर्शकों को बांधे रखा।

सांध्य सत्र में पत्थर घाट दीपमालाओं से जगमगा उठा। पंडित कालीचरण दीक्षित के नेतृत्व में संपन्न गंगा आरती के दौरान वैदिक मंत्रों की गूंज और श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। आरती के बाद बनारस घराने से जुड़े अंशुमन महाराज ने काशी रस वाद्यवृंद की जुगलबंदी प्रस्तुत की। सरोद, सितार, सारंगी, बांसुरी और तबले की संगति में ‘मसाने की होली’ की धुन के साथ बिठूर महोत्सव का भव्य और यादगार समापन हुआ।

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