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हाथों पे तू क्या लिखता है, सच सच कहना क्या दिखता है ….

हाथों पे तू क्या लिखता है

सच सच कहना क्या दिखता है

हाथों पे तू क्या लिखता है

जमा हुआ आँखों का पानी

क्या बाज़ारों में बिकता है

सूरज की कोई चमक खरीदे

कोई तिमिर से प्रेम निभाये

ऊँचे ऊँचे छत छज्जो से

क्या टूटा रस्ता दिखता है

कौन,किसे, कब, कैसे वाले

प्रश्न अनेकों हमनें पाले

सबके अपने अपने साँचे

समय समय पर चेहरे ढाले

क्या धुंधली सी शाम के आगे

सूरज थोड़ा भी टिकता है

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प्राची मिश्रा
कवयित्री

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