
मासिक धर्म शर्म नहीं, स्वास्थ्य और सम्मान का विषय है” — इसी सोच के साथ हजारों महिलाओं के जीवन में बदलाव ला रही हैं राखी गंगवार।
उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के एक छोटे से गांव से निकली एक साधारण शिक्षिका आज हजारों महिलाओं और किशोरियों के लिए उम्मीद, जागरूकता और आत्मविश्वास का पर्याय बन चुकी हैं। यह कहानी है राखी गंगवार की, जिन्हें लोग आज प्यार से “पैड वुमन” के नाम से जानते हैं। उनकी यात्रा केवल एक सामाजिक अभियान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साहस की मिसाल है जिसने वर्षों से चली आ रही झिझक और चुप्पी को चुनौती दी।
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म जैसे महत्वपूर्ण विषय पर खुलकर चर्चा नहीं होती। कई परिवारों में इसे शर्म और संकोच से जोड़कर देखा जाता है। नतीजतन, बड़ी संख्या में महिलाएं और किशोरियां मासिक धर्म स्वच्छता के प्रति जागरूक नहीं हो पातीं। यही वह सच्चाई थी जिसने राखी गंगवार को भीतर तक झकझोर दिया और उन्हें बदलाव की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया।
एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्य करते हुए राखी गंगवार ने महसूस किया कि उनके आसपास की अनेक महिलाएं और किशोरियां मासिक धर्म के दौरान असुरक्षित और अस्वच्छ तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। जानकारी के अभाव और सामाजिक संकोच के कारण वे अपनी समस्याओं को खुलकर साझा भी नहीं कर पाती थीं। संक्रमण, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां और मानसिक असहजता उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी थीं। राखी ने समझ लिया कि केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है।

इसी सोच के साथ वर्ष 2023 में उन्होंने अपने विद्यालय से “पैड बैंक” की शुरुआत की। यह एक छोटी पहल थी, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा उद्देश्य था—जरूरतमंद महिलाओं और किशोरियों को सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना तथा उन्हें मासिक धर्म स्वच्छता के प्रति जागरूक बनाना। शुरुआत में संसाधन सीमित थे, लेकिन उनका संकल्प मजबूत था। उन्होंने अपने निजी खर्च से सैनिटरी पैड खरीदकर जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचाने शुरू किए और गांव-गांव जाकर जागरूकता अभियान चलाए।
धीरे-धीरे यह प्रयास एक अभियान में बदलने लगा। जिन महिलाओं के लिए मासिक धर्म पर बात करना भी असहज था, वे अब अपनी समस्याएं खुलकर साझा करने लगीं। किशोरियों में आत्मविश्वास बढ़ा और परिवारों में भी इस विषय को लेकर सकारात्मक चर्चा शुरू हुई। समाज में बदलाव की जो छोटी सी चिंगारी राखी ने जलाई थी, वह अब कई गांवों तक रोशनी पहुंचाने लगी थी।
राखी गंगवार ने अपने मिशन को केवल सैनिटरी पैड वितरण तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने महिलाओं के समग्र स्वास्थ्य को केंद्र में रखते हुए सर्वाइकल कैंसर, ल्यूकोरिया, पोषण, व्यक्तिगत स्वच्छता और महिला स्वास्थ्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। उनके प्रयासों ने ग्रामीण महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग और आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया।
उनकी सोच हमेशा स्पष्ट और प्रेरणादायक रही है—“मासिक धर्म कोई शर्म नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सम्मान से जुड़ा विषय है।” यही संदेश उनके हर अभियान की आत्मा बन गया। उन्होंने महिलाओं को यह समझाने का प्रयास किया कि अपने शरीर और स्वास्थ्य के बारे में जानकारी रखना किसी भी तरह की झिझक का विषय नहीं होना चाहिए।
आज उनके नेतृत्व में चलाए गए अभियानों का प्रभाव अनेक गांवों में दिखाई देता है। सैकड़ों महिलाएं और किशोरियां मासिक धर्म स्वच्छता के प्रति जागरूक हो चुकी हैं। कई परिवारों की सोच बदली है और स्वास्थ्य शिक्षा को एक नई दिशा मिली है। उनका कार्य यह साबित करता है कि समाज में बड़ा परिवर्तन लाने के लिए बड़े पद या बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि मजबूत इरादों की आवश्यकता होती है।

राखी गंगवार को उनके सामाजिक योगदान के लिए विभिन्न संस्थाओं, शिक्षा मंचों और मीडिया संगठनों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान कोई पुरस्कार या प्रशस्ति पत्र नहीं है। उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि वह मुस्कान है जो किसी किशोरी के चेहरे पर तब दिखाई देती है, जब वह बिना किसी झिझक के अपने स्वास्थ्य के बारे में बात कर पाती है।
राखी गंगवार की कहानी केवल एक महिला की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह जागरूकता, शिक्षा और संवेदनशीलता से जन्मे सामाजिक परिवर्तन की कहानी है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि एक शिक्षिका केवल किताबों का ज्ञान नहीं देती, बल्कि समाज की सोच को भी नई दिशा दे सकती है।
आज बरेली की यह “पैड वुमन” हजारों महिलाओं और किशोरियों की आवाज बन चुकी हैं। उनका सपना है कि देश की हर बेटी स्वस्थ, जागरूक, आत्मविश्वासी और सम्मानजनक जीवन जी सके। यह सपना केवल उनका नहीं, बल्कि एक बेहतर और संवेदनशील समाज का सपना है, जिसकी नींव उन्होंने अपने साहस, समर्पण और सेवा भाव से रखी है।


