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मोहब्बत को निभाना चाहती हूं ……….

ये दुनिया बेवफ़ाई कर रही है,
इसे मैं छोड़ जाना चाहती हूं।।

ग़मों की धूप बढ़ती जा रही है,
किसी साए में जाना चाहती हूं।।

वफ़ा के नाम पर धोखे मिले हैं,
सो अब ख़ुद को बचाना चाहती हूं।।

तुम्हारी याद का रोशन दिया एक,
अँधेरों में जलाना चाहती हूं।।

जो अपने थे वही दुश्मन बने हैं,
ये क़िस्सा भूल जाना चाहती हूं।।

मोहब्बत की ज़मीं बंजर हुई तो,
नए सपने उगाना चाहती हूं।।

न दौलत की हवस है और न शोहरत,
फ़क़त इज़्ज़त कमाना चाहती हूं।।

शिखा, शिकवे-गिले सब भूल करके,
मोहब्बत को निभाना चाहती हूं।।

डॉ. शिखा दीप्ति दीक्षित

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