नया गीत ✨
जो तुमको वरदान लगे हैं, वो हम पर अभिशाप रहे हैं,
हमसे पूछो इक जीवन में, कितने पश्चाताप रहे हैं!
तुमने हमको घिरते देखा बीच महोत्सव, मेला, माया,
हमने खुद को उन मेलों के बीचोबीच अकेला पाया,
तुमने अब तक जिन गीतों पर ताली पीटी, वाह लगाई,
वो सब अपनी पीड़ाएँ थीं, रो-रो लिखी, हँस-हँस गाई!
तड़प के रह गए, रो न पाए,
होते-होते हो न पाए,
तब गीतों पे गीत लगाए, आग जलाई, ताप रहे हैं!
इक मुट्ठी आरोप समेटे, इक मुट्ठी में शाबाशी है,
फिर भी दिल की देख दिलेरी, अब भी प्रीत का प्रत्याशी है,
अपने घर के कोसे-भूले, दरबारों के ठुकराए हैं,
हर दिन शहर-शहर भटके हैं, तब जाकर दुनिया पाए हैं!
सो चेहरे की चमक-दमक ये, और जमीनी सनक-धनक ये,
जीवन भर की ठोक-पीट है, सहते जो चुपचाप रहे हैं!
सच है सारे योग प्रबल थे, हर योजना में सफल रहे हैं,
लेकिन पहले योग्य हुए थे, कुशल बने हैं, सरल रहे हैं,
जग को किन्तु कुंवर का जीवन बिन देखे आसान लगा है,
सिद्धार्थों ने ‘बुद्ध हुए’ का बहुत निजी नुकसान सहा है!
नुकसानों से जूझ रहे हैं,
उलाहनों को बूझ रहे हैं,
फिर भी घायल मन से मंजिल, नाप रहे थे! नाप रहे हैं!
— मनु वैशाली



