HomeNEWSपरेड रामलीला का स्वर्णिम काल, आज 150वीं बार होगा रावण वध

परेड रामलीला का स्वर्णिम काल, आज 150वीं बार होगा रावण वध

डेढ़ सौ साल से धर्म और परंपरा की विरासत संजो रही कानपुर की ऐतिहासिक रामलीला, भव्य मंचन और देवी-देवताओं की शोभायात्रा बनी आकर्षण का केंद्र

  • हरिओम गुप्ता

कानपुर नगर। धर्म, आस्था और भारतीय संस्कृति की परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने वाली कानपुर के परेड मैदान की ऐतिहासिक रामलीला इस वर्ष अपने 150वें वर्ष में पहुंच गई है। इस अवसर पर आज भव्य आयोजन के बीच रावण वध किया जाएगा। वर्षों से आयोजित हो रही यह रामलीला न केवल शहर, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। भगवान श्रीराम की लीलाओं के माध्यम से लोगों को धर्म, मर्यादा और रामराज्य के आदर्शों का संदेश दिया जाता है।

कानपुर की परेड रामलीला का इतिहास अंग्रेजी शासन के दौर से जुड़ा है। बताया जाता है कि इसका पहली बार मंचन हटिया में राजगद्दी के आयोजन के साथ शुरू हुआ था। समय के साथ रामलीला का स्वरूप और भव्य होता गया और इसका आयोजन परेड मैदान में होने लगा। धीरे-धीरे यह आयोजन शहर की प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल हो गया। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु रावण वध और रामलीला का मंचन देखने के लिए पहुंचते हैं।

श्री रामलीला सोसाइटी के पदाधिकारियों के प्रयासों से इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। रामलीला के आयोजन का उद्देश्य भगवान श्रीराम के आदर्शों और सनातन संस्कृति की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। ऐतिहासिक रूप से इस आयोजन में अंग्रेज अधिकारी भी शामिल होते थे। बताया जाता है कि अंग्रेजी शासन के दौरान रावण वध के बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण का रथ शहर की कोतवाली ले जाया जाता था, जहां अंग्रेज कोतवाल भगवान श्रीराम की आरती उतारते थे। यह परंपरा आज भी आयोजन की विशिष्ट पहचान मानी जाती है।

श्री रामलीला सोसाइटी के संयोजक जगत नारायण गुप्ता ने बताया कि रामलीला अपने 150वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। सोसाइटी के सभी पदाधिकारी पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ आयोजन को भव्य बनाने में जुटे रहते हैं। उन्होंने कहा कि इस परंपरा के माध्यम से लोगों को भगवान श्रीराम के आदर्शों से जोड़ने और भारतीय संस्कृति को संरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।

रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता, हनुमान जी और अन्य देवी-देवताओं की भव्य झांकियां निकाली जाती हैं, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती हैं। प्रतिदिन निकाली जाने वाली आरती यात्रा मेस्टन रोड स्थित रामगोला से शुरू होकर विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए रामलीला मैदान पहुंचती है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं और पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह का माहौल रहता है।

जगत नारायण गुप्ता ने बताया कि रामलीला के समापन के बाद कलक्टरगंज में भरत मिलाप का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही इस वर्ष की धार्मिक परंपराओं का समापन होता है। उन्होंने कहा कि मेले में सभी धर्मों और जातियों के लोग शामिल होते हैं, जो सामाजिक एकता और आपसी सद्भाव का संदेश देता है। सोसाइटी का प्रयास है कि हर वर्ष नए आकर्षण जोड़कर रामलीला को और अधिक भव्य, सुंदर और सुव्यवस्थित बनाया जाए।

डेढ़ सौ वर्षों की यह परंपरा कानपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। परेड की रामलीला आज भी लोगों को धर्म, आस्था, मर्यादा और सामाजिक एकता का संदेश दे रही है।

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