HomeSTORY / ARTICLEअंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...........

अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ………..

आज वर्तमान दौर में हम ऐसे समय से गुजर रहे हैं जहां एक ओर बेटियों के लिए बड़े-बड़े स्लोगन लिखते हैं और वहीं दूसरी ओर समाज में बेटियों से हो रहे दुर्व्यवहार के लिए पूरी तरह जागृत नहीं। 

आए दिन देखती हूं बेटियों के साथ दुष्कर्म करके उन्हें मारा जा रहा है, और मारने वाले कोई बड़ी सजा के पात्र भी नहीं बनते, कई बार तो कई बड़े माननीय जजों से अजीब और गरीब टिप्पणी सुनने को मिलती है, जो गले के नीचे उतरती ही नहीं, जो दुर्व्यवहार के अपराधिक मामले में भी कई सारे सही और गलत बिंदु खोज निकालते हैं। अभी हाल ही में एक बड़े जज द्वारा की गई टिप्पणी में विवादित बयान सुनने को मिला जिसके अंतर्गत सरकार द्वारा चलाए गए अभियान गुड टच बेड टच की सारी मर्यादा को अस्त व्यस्त कर दिया,, जब बड़े-बड़े जज ही बेटियों के साथ दुष्कर्म किए जाने पर अजीब गरीब टिप्पणी देंगे तो फिर ऐसे अभियानों का क्या मतलब। 

अभी कुछ समय ही हुआ है गणेश विसर्जन को, अब नवदुर्गा आने वाले हैं, हम सब अपनी अपनी आस्था छोटी बच्चियों के रूप में पूजन करके व्यक्त करेंगे परंतु कभी सोचा है छोटी बच्चियों कहां से लायेंगे । आज भ्रूण हत्या जैसे कार्य पर भले ही सरकार ने रोक लगा दी हो पर गर्भ में पल रहे शिशु की पहचान कर आज भी लोग लड़कियों को नहीं रखते। आज भी कई केस ऐसे देखे जा सकते हैं यह लड़की के जन्म होने पर उन्हें या तो मार दिया गया या कहीं छोड़ दिया गया इस संसार में अपने स्वार्थ हेतु शक्ति की आराधना सबको करनी है, पर शक्ति का सम्मान करना शायद लोगों के बस की बात नहीं।

हमारे हिंदू रीति रिवाज के अनुसार धार्मिक कार्यों में प्रसाद बांटे जाने की परंपरा है जहां सबसे पहले छोटी कन्याओं को प्रसाद बांटा जाता है अर्थात ईश्वर का भोग लगा के सबसे पहले कन्याओं को देने की परंपरा है।

पहले कन्याएं आसानी से मिल जाया करती थी अब ढूंढने से भी नहीं मिलती कि हम ईश्वर के निमित्त मात्र आस्था रखकर कुछ कन्याओं को भोजन करने की परंपरा भी अब संकट में है।

बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के नारे तो आप अक्सर सुनते होंगे पर क्या वास्तविक जीवन में हम बेटियों को इतना महत्व दे रहे हैं जितना उन्हें देना चाहिए,, रोज घटित हो रही घटनाओं के कारण 

कई माता-पिता आज भी बेटियों को जन्म देने में संकोच करते हैं 

उनकी देखरेख एवं समाज में, बढ़ रही हैवानियत भी बेटी के जन्म पर दुख मानने का सबसे बड़ा कारण है । दरिंदों से अपनी बेटी को बचाने का मानसिक भय के बीच बेटियों के जन्म की दर घटती ही जा रही है।

यदि हम जांच करें तो पाएंगे की परिवार में ही यौन शोषण की घटनाएं अधिकांश होती है क्योंकि परिवार का आपसी मामला होता है और समाज में अपनी बेइज्जती के डर से लोग इस प्रकार की घटनाओं को उजागर नहीं करते ! परंतु यह एककड़वा सत्य है 

बेटियों का लालन-पालन करना आज बहुत ही कठिन हो गया है।

वही हम देख सकते हैं की आज लड़कियों की जन्म दर लड़कों की तुलना में इतनी कम हो चुकी है कि वैवाहिक प्रस्ताव के लिए भी लड़कियां नहीं है कई गांव ऐसे हैं जिनमें शादी के लिए लड़कियां है ही नहीं वह मजबूरी में गरीब और असहाय लड़कियों को बाहर से खरीदते हैं फिर एक लड़की का विवाह दो दो तीन तीन लड़कों से कर रहे हैं। यह गोपनीयता के साथ होता है हरियाणा के कई गांव में यह आज भी यह सब आम है।

बेटियों को उपभोग की वस्तु समझने वाला समाज यह भूल रहा है की ईश्वर के द्वारा संतति उत्पन्न करने की क्षमता सिर्फ और सिर्फ स्त्रियों में है आज हम बेटियों को सुरक्षित रखते हैं तो कल हमारा भविष्य भी सुरक्षित है। बिना नारी के नारायण कैसे । बेटियों के लिए सिर्फ बेटियों के मां-बाप की ही जिम्मेदारी नहीं है आपकी भी है, किसी की भी बेटी को यदि असुरक्षित पाते हैं तो आपका पहला कर्तव्य है उसकी सुरक्षा प्रदान करना। क्योंकि बेटी है तो कल है। 

~ आशी प्रतिभा (स्वतंत्र लेखिका) 

मध्य प्रदेश, भारत

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