एकदंत दयावंत, गजानन प्रभु गणेश हो।
विघ्न हरे, कष्ट हरते, ज्ञान के स्वरूप हो।।
रिद्धि सिद्धि वाम अंग, संग विराजमान हैं।
चैतन्य प्रभु परमात्मा, अद्भुत विख्यात हो।।
गजानन गणपति, श्री ब्रह्म के स्वरूप हो।
आत्मा के उत्कर्ष हेतु, भक्ति के प्रपात हो।।
वक्रतुंड भालचंद्र, महाकाय सूर्य समान हो।
अंधकार भेदक प्रभु, सृष्टि के बिहान हो।।
बुद्धि, विद्या के सागर, अनंत ज्ञान धारा हो।
चेतना परम पुष्प सी, शक्ति के प्रमाण हो।।
गौरी पुत्र हे गणेश, हर घर मंगल निवास हो।
मंगल कलश के प्रभु, हर घर स्थान हो।।
पाप हरो, कष्ट हरो, श्री विघ्न का विनाश हो।
सेवा करें भक्तजन गजानंद, सर पर तेरा हाथ हो।।

✍️ आशी प्रतिभा
ग्वालियर, मध्य प्रदेश
स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना


