कृषि विज्ञान केंद्र दिलीप नगर में किसानों को फसल अवशेषों के बेहतर प्रबंधन और सरकारी योजनाओं की दी गई जानकारी, प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देकर किया गया सम्मानित
- हरिओम गुप्ता
कानपुर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्र दिलीप नगर की ओर से फसल अवशेष प्रबंधन विषय पर आयोजित पांच दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हो गया। प्रशिक्षण का आयोजन 28 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 तक किया गया।
प्रशिक्षण के दौरान किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन से संबंधित विभिन्न कृषि यंत्रों की जानकारी दी गई। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार की ओर से उपलब्ध सुविधाओं, कृषि यंत्रों पर मिलने वाली सब्सिडी तथा योजनाओं का लाभ लेने की प्रक्रिया के बारे में भी विस्तार से बताया गया।
किसानों को फसल अवशेष जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि फसल अवशेष जलाने से मानव स्वास्थ्य, मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। किसानों को अवशेष जलाने के बजाय उनके उचित प्रबंधन और उपयोग के विभिन्न तरीकों से अवगत कराया गया।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों को बताया गया कि फसल अवशेषों का उपयोग आर्थिक समृद्धि के लिए भी किया जा सकता है। अवशेषों से विभिन्न प्रकार के उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इसके अलावा फसल अवशेषों का इस्तेमाल कर गुणवत्तापूर्ण मशरूम उत्पादन भी किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने फसल अवशेषों को खेत में जल्द से जल्द डिकंपोज करने के लिए वेस्ट डीकंपोजर के प्रयोग की जानकारी दी। किसानों को वेस्ट डीकंपोजर तैयार करने की प्रक्रिया और खेत में इसके उपयोग के तरीके भी बताए गए।
प्रशिक्षण में किसानों को यह भी जानकारी दी गई कि फसल अवशेषों का उचित तरीके से प्रबंधन और खेतों में उपयोग करने से मृदा स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने फसल अवशेषों को जैविक तरीके से उपयोग में लाने की तकनीकों के बारे में किसानों को जानकारी दी।
पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान डॉ. अजय कुमार सिंह, डॉ. खलील खान, डॉ. दीपक मिश्रा और डॉ. राजेश राय सहित अन्य वक्ताओं ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन से जुड़े विभिन्न विषयों पर प्रशिक्षण दिया।
प्रशिक्षण के अंतिम दिन प्रतिभागी किसानों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान किसानों ने प्रशिक्षण में मिली जानकारी को खेती में अपनाने और फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका उपयोग करने की बात कही।


