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भीड़-भाड़ में दुनिया की, जैसे अँखियों को मींचे ………

भीड़-भाड़ में दुनिया की
जैसे अँखियों को मींचे
क़दम चल रहे आगे-आगे
छूट रही मैं पीछे।
कौन डगर और कौन नगर में
बढ़ी चली जाती हूँ
जिस मंज़िल पर जाना उसका
पता नहीं पाती हूँ।
आकाँक्षाओं का बंदी मन
ढूँढ़ रहा आमंत्रण
पीड़ा पगा दर्द का मारा
कैसे करूँ नियंत्रण।
घटनाओं के साक्षी पल-छिन
करने लगे किनारा
नेह वरेगा कैसे मन,जो
रहा नेह का मारा।
आगत और अनागत सारे
भाव उदासी भीने
बस इस रंग बिना ज्यों दूजा
रंग इन्हें ना चीन्हे।
अनुरागी या वैरागी मैं
हूँ दुविधा की मारी
जैसे राग-विराग रंग में
डूबी दुनिया सारी

~ डॉ.पूनम यादव

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