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मैं एकबार मिलना चाहती हूँ, उन तमाम लोगों से,जो मंजिल के पास पहुँच कर ……..

मैं एकबार मिलना चाहती हूँ
उन तमाम लोगों से,
जो मंजिल के पास पहुँच कर,
रत्ती भर दूरी से वापिस लौट आए हों।
जिन्होंने कुछ हासिल करने से
ठीक पहले उसे खो दिया हो।
उस किसान से जिसने फसलों की ख़ातिर
पूरी जी जान लगा दी हो,
और अन्त में कटाई से पहले घोर बारिश ने
उनकी सारी उम्मीद तबाह करदी हो।
उस लड़की से जिसने आगे बढ़ना चाहा हो
मगर बापू ने कच्ची उम्र में बेटी ब्याह दी हो।
उस युवा से जिसके प्यार की पहली पंखुड़ी ,
अनायास ही कुम्हला गई हो।
जिसके उम्मीदों के बाँध ढह गए हों।
जो सफ़र में अकेले रह गए हों।
मुझे सच में जिज्ञासा है कि
आखिर क्या सोचते होंगे वो लोग,
उनकी क्या दिनचर्या होगी?
क्या वो किसी से अपनी संवेदनाएँ कहते होंगे?
या यूँही अक्सर चुप रहते होंगे?
चुप रहना भी आसान कहाँ होता होगा?
क्या वो सामान्य हो पाते होंगे कभी?
या यूँही उम्रभर एक बोझ सीने में रखकर,
अन्त में मर जाते होंगे एकदिन।

~ ‘रोली’ शुक्ला …….

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