बदलते सामाजिक परिवेश में लिव-इन रिलेशनशिप का चलन तेजी से चर्चा का विषय बन रहा है। विवाह के पारंपरिक बंधन से अलग इस रिश्ते में दो वयस्क आपसी सहमति से बिना शादी किए एक साथ रहते हैं। जहां यह व्यवस्था व्यक्तिगत स्वतंत्रता और एक-दूसरे को समझने का अवसर देती है, वहीं सामाजिक दबाव, भावनात्मक असुरक्षा और रिश्ते के भविष्य को लेकर अनिश्चितता मानसिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती भी बन सकती है।
डॉ. मनोज कुमार तिवारी, वरिष्ठ परामर्शदाता, एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर व्यक्ति को सामाजिक, भावनात्मक और मानसिक पहलुओं को समझना बेहद जरूरी है।
क्या है लिव-इन रिलेशनशिप?
लिव-इन रिलेशनशिप ऐसी व्यवस्था है, जिसमें दो वयस्क बिना औपचारिक विवाह के पति-पत्नी की तरह एक ही छत के नीचे रहते हैं। यह संबंध दोनों की स्वतंत्र इच्छा और आपसी सहमति पर आधारित होता है।
इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं:
- बिना विवाह साथ रहना: इसमें जोड़े कानूनी या पारंपरिक विवाह के बंधन में बंधे बिना साथ रहते हैं।
- आपसी सहमति: दोनों व्यक्तियों की स्वतंत्र इच्छा इस रिश्ते का आधार होती है।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता: पारंपरिक विवाह की तुलना में इसमें व्यक्तिगत स्वायत्तता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता अधिक हो सकती है।
- वैवाहिक प्रकृति का संबंध: केवल डेटिंग या सामान्य दोस्ती को लिव-इन रिलेशनशिप नहीं कहा जा सकता। इसके लिए संबंध की प्रकृति और साथ रहने की परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।
लिव-इन रिलेशनशिप के लिए क्या हैं जरूरी शर्तें?
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए दोनों व्यक्तियों का वयस्क होना और उनकी स्वतंत्र सहमति होना आवश्यक है। किसी भी प्रकार का दबाव, धोखाधड़ी या जबरदस्ती स्वीकार्य नहीं है।
भारत में विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु महिलाओं के लिए 18 वर्ष और पुरुषों के लिए 21 वर्ष है। हालांकि, लिव-इन संबंधों की कानूनी स्थिति को केवल विवाह की शर्तों के आधार पर निर्धारित नहीं किया जाता। दोनों की वैवाहिक स्थिति और संबंध की वास्तविक प्रकृति भी महत्वपूर्ण होती है।
भारत में कितना बढ़ रहा है लिव-इन रिलेशनशिप का चलन?
शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, आर्थिक आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति बढ़ती जागरूकता ने लिव-इन रिलेशनशिप को सामाजिक चर्चा का प्रमुख विषय बना दिया है। युवा पीढ़ी का एक वर्ग विवाह से पहले साथ रहकर एक-दूसरे को समझने के विकल्प को प्राथमिकता देता है।
हालांकि, इस संबंध में प्रस्तुत सर्वेक्षणों के आंकड़ों को उनके मूल स्रोत और सर्वेक्षण पद्धति के आधार पर समझना जरूरी है।
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर क्या है कानूनी स्थिति?
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप के लिए कोई अलग व्यापक कानून नहीं है, लेकिन इसे पूरी तरह गैरकानूनी भी नहीं माना गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। न्यायिक फैसलों में बालिग व्यक्तियों के अपनी इच्छा से साथ रहने के अधिकार को भी मान्यता दी गई है।
इसके अतिरिक्त, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2(एफ) में ‘विवाह की प्रकृति का संबंध’ शामिल है। निर्धारित परिस्थितियों में ऐसे संबंध में रहने वाली महिला को घरेलू हिंसा से संरक्षण और अन्य कानूनी राहत मिल सकती है।
लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चों के अधिकारों को लेकर भी भारतीय न्यायालयों ने महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। हालांकि, संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े अधिकार मामले की परिस्थितियों और लागू कानूनों पर निर्भर करते हैं।
लिव-इन रिलेशनशिप के फायदे
इस रिश्ते के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं, जिनकी वजह से कई युवा इसे विवाह से पहले एक विकल्प के रूप में देखते हैं।
- एक-दूसरे को समझने का अवसर: साथ रहने से दोनों व्यक्ति एक-दूसरे की आदतों, व्यवहार, स्वभाव और विचारों को करीब से समझ सकते हैं।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता: व्यक्ति अपनी पसंद और प्राथमिकताओं के अनुसार जीवन जी सकता है।
- करियर पर ध्यान: दोनों लोग अपने करियर और व्यक्तिगत लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आपसी तालमेल बना सकते हैं।
- जिम्मेदारियों का बंटवारा: घरेलू और आर्थिक जिम्मेदारियों को आपसी सहमति से साझा किया जा सकता है।
- रिश्ते की अनुकूलता समझना: साथ रहने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि दोनों के विचार और जीवनशैली एक-दूसरे के अनुकूल हैं या नहीं।
लिव-इन रिलेशनशिप के नुकसान और चुनौतियां
इसके सकारात्मक पहलुओं के साथ कुछ ऐसी चुनौतियां भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
- सामाजिक कलंक: पारंपरिक सोच वाले परिवारों और समाज में ऐसे रिश्तों को स्वीकार्यता नहीं मिलने से आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
- कानूनी जटिलताएं: संपत्ति, भरण-पोषण और अलगाव से जुड़े मामलों में कानूनी स्थिति परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकती है।
- भावनात्मक असुरक्षा: रिश्ते में प्रतिबद्धता और भविष्य को लेकर स्पष्टता नहीं होने पर तनाव पैदा हो सकता है।
- बच्चों से जुड़ी चुनौतियां: बच्चों को सामाजिक स्वीकार्यता, पारिवारिक परिस्थितियों और माता-पिता के बीच संबंधों में तनाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
लिव-इन रिलेशनशिप का मानसिक स्वास्थ्य पर क्या पड़ता है असर?
लिव-इन रिलेशनशिप का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पूरी तरह रिश्ते की गुणवत्ता, आपसी विश्वास, सम्मान और भावनात्मक सुरक्षा पर निर्भर करता है।
सकारात्मक प्रभाव
- भावनात्मक सहारा: एक-दूसरे के साथ रहने से अकेलेपन की भावना कम हो सकती है। मुश्किल परिस्थितियों में साथी का सहयोग मानसिक मजबूती प्रदान कर सकता है।
- बेहतर आपसी समझ: एक-दूसरे की आदतों और व्यवहार को समझने से रिश्ते में संवाद और तालमेल बेहतर हो सकता है।
- तनाव में कमी: प्यार, सम्मान और सहयोग से भरे रिश्ते में ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन की भूमिका भावनात्मक जुड़ाव और तनाव नियंत्रण में सहायक हो सकती है।
- मानसिक सुकून: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपसी सहमति के आधार पर बनाया गया रिश्ता कई लोगों को मानसिक संतुष्टि दे सकता है।
नकारात्मक प्रभाव
- सामाजिक और पारिवारिक दबाव: परिवार की नाराजगी, सामाजिक विरोध और लोगों की आलोचना के कारण तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
- भविष्य को लेकर अनिश्चितता: रिश्ते की दिशा और प्रतिबद्धता स्पष्ट नहीं होने पर असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।
- आपसी विवाद: लगातार झगड़े, असहमति, संदेह और भावनात्मक शोषण मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।
लिव-इन रिलेशनशिप टूटने पर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है गहरा असर
लंबे समय तक साथ रहने के बाद रिश्ता टूटना किसी भी व्यक्ति के लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो सकता है। अचानक साथी से अलगाव होने पर व्यक्ति को मानसिक और सामाजिक स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
- तनाव और अवसाद: रिश्ता टूटने के बाद व्यक्ति में उदासी, निराशा, चिंता और अवसाद के लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
- अकेलेपन का एहसास: लंबे समय तक साथ रहने के बाद अचानक अकेले रहना भावनात्मक रूप से परेशान कर सकता है।
- नींद की समस्या: बार-बार पुरानी बातों को याद करना, चिंता और मानसिक बेचैनी अनिद्रा का कारण बन सकती है।
- दिनचर्या प्रभावित होना: अलगाव के बाद खानपान, नींद और दैनिक गतिविधियां अनियमित हो सकती हैं।
- कामकाज पर असर: मानसिक उलझन के कारण पढ़ाई, नौकरी और रोजमर्रा के कार्यों में एकाग्रता कम हो सकती है।
- पहचान का संकट: लंबे समय तक किसी रिश्ते में रहने के बाद अलगाव होने पर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र पहचान दोबारा स्थापित करने में कठिनाई हो सकती है।
- नशे की प्रवृत्ति: भावनात्मक दर्द से बचने के लिए कुछ लोग शराब, सिगरेट या अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेने लगते हैं, जिससे समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
लिव-इन रिलेशनशिप टूटने के बाद मानसिक स्वास्थ्य कैसे संभालें?
रिश्ता टूटने के बाद भावनात्मक रूप से खुद को संभालना बेहद जरूरी है। इसके लिए कुछ उपाय अपनाए जा सकते हैं।
- अपनी भावनाओं को स्वीकार करें: दुख, गुस्सा, निराशा और अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है। भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें समझने और स्वीकार करने का प्रयास करें। डायरी लिखना भी मददगार हो सकता है।
- करीबी लोगों से बातचीत करें: परिवार, भरोसेमंद दोस्तों और अपने करीबी लोगों से अपनी परेशानी साझा करें।
- विशेषज्ञ की मदद लें: यदि चिंता, अवसाद या नींद की समस्या लंबे समय तक बनी रहे और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगे, तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लें।
- दिनचर्या व्यवस्थित करें: नियमित खानपान, पर्याप्त नींद और व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
- खुद को समय दें: अपनी रुचियों, शौक, फिटनेस और करियर पर ध्यान केंद्रित करें।
- नशे से दूर रहें: मानसिक तनाव से निपटने के लिए शराब, सिगरेट या अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेने से बचें।
निष्कर्ष: रिश्ते में स्वतंत्रता के साथ मानसिक सुरक्षा भी जरूरी
लिव-इन रिलेशनशिप आधुनिक समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रिश्तों के बदलते स्वरूप का एक पहलू है। इसके अपने फायदे और चुनौतियां हैं। किसी भी रिश्ते की सफलता केवल उसके सामाजिक या कानूनी स्वरूप पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आपसी विश्वास, सम्मान, संवाद, जिम्मेदारी और भावनात्मक सुरक्षा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए लिव-इन रिलेशनशिप में कदम रखने से पहले दोनों व्यक्तियों को अपने अधिकारों, जिम्मेदारियों और भविष्य को लेकर स्पष्टता रखनी चाहिए। वहीं, रिश्ता टूटने की स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।

- मनोज कुमार तिवारी, वरिष्ठ परामर्शदाता, एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी।


