HomeSTORY / ARTICLEहिन्दू धर्म और श्राद्धकर्म का महातम्य ।

हिन्दू धर्म और श्राद्धकर्म का महातम्य ।

•ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितृ अर्थात् पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए।

हिन्दू धर्म के मार्कंडेय पुराण में, (गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पेज २३७ पर है जिसमें मार्कंडेय पुराण व ब्रह्म पुराणंक एक साथ जिल्द किया गया है) भी श्राद्ध के विषय में एक कथा का वर्णन मिलता है।

•शास्त्रों में पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए स्वधा स्त्रोत व श्रीमदभगवदगीता के अध्याय ७ का पाठ करने के लिए विशेष रूप से वर्णन किया गया है।

“स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं, यदि वारत्रयं स्मरेत्।

श्राद्धस्य फलमाप्नोति बलेश्च तर्पणस्य च॥

(यदि मनुष्य स्वधा स्वधा स्वधा, तीन बार स्मरण कर ले, तो वह श्राद्ध, बलिवेश्वदेव व तर्पण का फल प्राप्त कर लेता है।)

●श्राद्ध पक्ष में क्यों दिया जाता है– कौए, कुत्ते और गाय को अन्न दान?? जानिये कारण।

यजुर्वेद में पांच प्रकार के यज्ञ का वर्णन मिलता है, जिनमें से दो यज्ञ- देवयज्ञ व बलिवेश्वदेव यज्ञ के विषय में विस्तार से बताया गया है। बलिवेश्वदेव यज्ञ प्रकृति और प्राणियों के प्रति समर्पित है। इसमें माता पिता, पूर्वजों के अतिरिक्त मानव जाति को प्रकृति के प्रति करुणा का भाव रखने, कल्याण व उपकार करने का दायित्व बताया गया है। इसमें- समस्त वनस्पतियाँ, पेड़ पौधे, भू, चींटी, कुत्ता, गौ सेवा आदि का उपकार करने का धर्म बताया गया है। बलिवेश्वदेव यज्ञ को भूत यज्ञ भी कहा गया है। पंच महाभूत से ही मानव शरीर है। इसी कारण से पितृ पक्ष में कौए, कुत्ते, गाय को अन्न, जल प्रदान करने का विधान है।

●हिन्दू धर्म से जुड़ी छोटी-छोटी महत्वपूर्ण बातों को समझने के लिए शास्त्रीय अध्ययन करना आवश्यक है लेकिन आजकल इन बातों को जानने, समझने का समय किसी के पास नहीं है। हिन्दू धर्मग्रंथों, शास्त्रों आदि से जुड़ी एक-एक बात को गहराई से समझने पर ही “क्यों, क्या और कैसे” जैसी जिज्ञासा शान्त की जा सकती है। क्यूंकि हिंदू सनातन संस्कृति में हर एक तर्क के पीछे असंख्य प्राकृतिक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण छिपे हुए हैं और इनको बेहतर तरीके से बाहर तभी निकाला जा सकता है जब इनका निरंतर अध्ययन व प्रयोग दैनिक जीवन में किया जाता रहे। इनमें कोई भी बात बिना किसी कारण के नहीं कही गयी है। विभिन्न लोक मान्यताएँ, प्रथा, परम्परा, रीति रिवाज आदि भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं लेकिन इन सभी का कहीं ना कहीं एक मात्र आधार हिन्दू सनातन संस्कृति ही है।

हमारी भावी युवा पीढ़ी के पास हिन्दू धर्म शास्त्रों, पुराणों आदि को लेकर कोई जागरुकता नहीं है, ना ही वह इस अमूल्य ज्ञान को अर्जित करने को लेकर उत्सुक ही है। युवा पीढ़ी ने एक निराशावादी दृष्टिकोण अपनाया हुआ है जोकि उनके उत्तम आचरण व व्यक्तित्व के निर्माण के लिए एवं हिन्दू धर्म संस्कृति की उन्नति के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

~ अशनिका शर्मा

आचार्या- वैदिक ज्योतिष।

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