
आज यानी 19 मार्च 2026 से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ हो गया है। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन श्रद्धालु सबसे पहले घटस्थापना (कलश स्थापना) कर मां का आह्वान करते हैं, जिसके बाद शैलपुत्री माता की पूजा की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। उनके स्वरूप में वह सफेद वस्त्र धारण किए, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल लिए नंदी बैल पर सवार दिखाई देती हैं। माथे पर अर्धचंद्र धारण करने वाली देवी को उमा और वृषोरूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। मां का यह रूप करुणा, स्नेह और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
- प्रथम मुहूर्त: सुबह 6:52 बजे से 7:43 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक
मां शैलपुत्री के प्रमुख मंत्र
- ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
- वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
प्रार्थना मंत्र
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
मां शैलपुत्री की आरती
शैलपुत्री मां बैल पर सवार,
करें देवता जय-जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी,
तेरी महिमा किसी ने ना जानी।।
पार्वती तू उमा कहलावे,
जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू,
दया करे धनवान करे तू।।
भोग में क्या चढ़ाएं
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को गाय के घी और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से दूध से बनी बर्फी अर्पित करना फलदायी माना गया है।
महत्व
नवरात्रि के प्रथम दिन की पूजा से जीवन में सुख-समृद्धि, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मान्यता है कि सच्चे मन से पूजा करने पर मां शैलपुत्री भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।
डिस्क्लेमर:
यह जानकारी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और ज्योतिषीय स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।



