1977 में 300 रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा गया था चकबंदी लेखपाल, 41 साल पुरानी अपील खारिज
- अखिलेश कुमार
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगभग 49 वर्ष पुराने रिश्वतखोरी के मामले में दोषी चकबंदी लेखपाल महेश चंद की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी 41 वर्ष पुरानी आपराधिक अपील खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकल पीठ ने आरोपी को शेष एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा काटने के लिए चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि सतर्कता विभाग द्वारा बिछाए गए ट्रैप और स्वतंत्र गवाहों के साक्ष्य विश्वसनीय हैं, तो शिकायतकर्ता की गवाही का अभाव भ्रष्टाचार के मामले को कमजोर नहीं करता।
मामला वर्ष 1977 का है, जब कानपुर तहसील के चकबंदी विभाग में तैनात लेखपाल महेश चंद पर एक ग्रामीण से चकबंदी संबंधी मामले में राहत दिलाने के नाम पर 400 रुपये रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। शिकायतकर्ता वीरेंद्र सिंह ने सतर्कता विभाग से संपर्क कर इसकी शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद अधिकारियों ने सुनियोजित तरीके से ट्रैप बिछाया।
एक अप्रैल 1977 को फिनोलफ्थेलिन पाउडर लगे 100-100 रुपये के तीन नोट लेखपाल को दिए गए। रिश्वत लेने के बाद सतर्कता टीम ने उसे रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। तलाशी के दौरान आरोपी की जेब से चिह्नित नोट बरामद हुए और सोडियम कार्बोनेट परीक्षण में उसके हाथ तथा जेब का घोल गुलाबी हो गया, जिससे रिश्वत लेने की पुष्टि हुई।
वर्ष 1985 में ट्रायल कोर्ट ने महेश चंद को भारतीय दंड संहिता की तत्कालीन धारा 161 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 की धारा 5(2) के तहत दोषी ठहराते हुए एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, सह-अभियुक्त कानूनगो को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया था।
दोषसिद्धि के बाद महेश चंद जमानत पर रिहा हो गया और इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की, जो चार दशक से अधिक समय तक लंबित रही। अब हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और आरोपी को चार सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है।


