
सीएसए कानपुर में देशभर के करीब 100 दलहन वैज्ञानिक जुटे, किसान की आय और लाभप्रदता बढ़ाने पर हुआ मंथन
- हरिओम गुप्ता
कानपुर नगर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर में अखिल भारतीय समन्वित रबी दलहन अनुसंधान परियोजना की 31वीं वार्षिक समूह बैठक का शुभारंभ हुआ। दो दिवसीय इस राष्ट्रीय वैज्ञानिक बैठक में देश के विभिन्न राज्यों से करीब 100 दलहन वैज्ञानिकों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का आयोजन सीएसए कानपुर एवं भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के सचिव तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने की। उन्होंने दलहन अनुसंधान की वर्तमान चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए लक्ष्य आधारित कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया।
किसान की आय और लाभप्रदता हो सर्वोच्च प्राथमिकता
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि किसानों के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लाभप्रदता बढ़ाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अनुसंधान एवं नई तकनीकों का विकास किसानों की आय और लाभ बढ़ाने की दिशा में किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि दलहन फसलों की उत्पादकता में आ रही बाधाओं को दूर करते हुए ‘उपज बाधा’ को तोड़ना होगा और इसके लिए स्पष्ट उत्पादकता लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए। उत्पादन में अनिश्चितता का असर बाजार पर भी पड़ता है, इसलिए अनुसंधान में उत्पादन के साथ बाजार की जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
जलवायु अनुकूल तकनीकों पर जोर
डॉ. जाट ने जैविक एवं अजैविक तनावों के प्रभाव को कम करने के लिए जलवायु अनुकूल एवं तनाव सहनशील तकनीकों के विकास की आवश्यकता बताई। उन्होंने दलहनी फसलों में फास्फोरस के संतुलित एवं उचित प्रबंधन के साथ पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने वाली आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित सर्वोत्तम कृषि पद्धतियों को व्यापक स्तर पर किसानों तक पहुंचाना और उनका प्रभावी अंगीकरण सुनिश्चित करना जरूरी है। इसके लिए मजबूत एवं विश्वसनीय बीज प्रणाली विकसित करने पर भी विशेष ध्यान देना होगा, ताकि किसानों को समय पर गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्ध हो सके।
नई प्रजातियों और तकनीकों से बढ़ेगा दलहन उत्पादन
उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डी.के. यादव ने कहा कि उपलब्ध नवीन प्रजातियों और सफल कृषि तकनीकों को दलहनी फसलों में शामिल कर उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।
सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ. एस.के. झा ने बताया कि देश के कुल दलहन उत्पादन में करीब 60 प्रतिशत योगदान रबी दलहनी फसलों का है। उन्होंने कहा कि दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कर उसकी उर्वरता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
किसानों तक तकनीक पहुंचाने पर बल
भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. जी.पी. दीक्षित ने कहा कि वैज्ञानिकों और किसानों के बीच तकनीकी अंतर को कम करने के लिए प्रथम पंक्ति प्रदर्शन के माध्यम से किसानों को जागरूक किया जा रहा है। उन्होंने कम लागत वाली तकनीकों, विशेष रूप से जैविक उर्वरकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
सीएसए के कुलपति डॉ. संजीव गुप्ता ने कहा कि दलहन उत्पादन के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने बताया कि देश में उकठा रोग के प्रति रोगरोधी प्रजाति का विकास सर्वप्रथम सीएसए विश्वविद्यालय द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि दलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा पर्याप्त बजट का प्रावधान किया गया है।
बायो-फोर्टिफाइड और मशीन से कटाई वाली प्रजातियों पर काम
परियोजना समन्वयक डॉ. शैलेश त्रिपाठी ने गत वर्ष की उपलब्धियों का प्रस्तुतिकरण किया। उन्होंने बताया कि परियोजना के अंतर्गत बायो-फोर्टिफाइड तथा मशीन से कटाई योग्य प्रजातियों के प्रचार-प्रसार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
कार्यक्रम में सहायक महानिदेशक (बीज) डॉ. बी.आर. चौधरी, कृषि आयुक्त डॉ. पी.के. सिंह, डॉ. मसूद अली सहित अन्य वैज्ञानिक एवं अधिकारी उपस्थित रहे।
पेस्टीसाइड प्रयोगशाला का किया निरीक्षण
उद्घाटन समारोह के बाद डॉ. एम.एल. जाट ने विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग में स्थापित पेस्टीसाइड प्रयोगशाला का भ्रमण किया। उन्होंने प्रयोगशाला के रखरखाव एवं वहां किए जा रहे कार्यों की सराहना की।
दो दिवसीय बैठक में रबी दलहनी फसलों की उत्पादकता, गुणवत्ता, रोग एवं कीट प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन, जलवायु अनुकूल तकनीक तथा किसानों तक उन्नत तकनीकों की पहुंच सुनिश्चित करने सहित विभिन्न विषयों पर वैज्ञानिक मंथन किया जा रहा है।


