अजित फाउंडेशन में रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘आखिरी उदारवादी और अन्य आलेख’ पर हुई समीक्षा, गांधी, नेहरू, साहित्य और लोकतांत्रिक मूल्यों पर वक्ताओं ने रखे विचार
- अमित सिंह
बीकानेर। अजित फाउंडेशन की ओर से रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘आखिरी उदारवादी और अन्य आलेख’ पर पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि एवं विचारक डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि मनुष्य की स्वतंत्रता सबसे अधिक मूल्यवान है। उन्होंने कहा कि रामचंद्र गुहा ने इस पुस्तक में आंकड़ों के बजाय व्यक्तियों, उनके विचारों और जीवन की समग्रता को केंद्र में रखा है। पुस्तक में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, विनोबा भावे सहित अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के विचारों और योगदान को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
डॉ. आचार्य ने कहा कि किसी विषय को केवल विशेषज्ञता के सीमित दायरे में देखने के बजाय जीवन की व्यापकता को समझना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर व्यक्ति का बौद्धिक विकास सीमित हो सकता है। उन्होंने कहा कि गुहा की पुस्तक स्वतंत्र चिंतन के महत्व को सामने लाती है। इसमें आधुनिकता की ओर बढ़ते समाज के साथ उत्पन्न होने वाली समस्याओं और स्वतंत्र विचारों की आवश्यकता पर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि इतिहासकार डॉ. भंवर भादानी ने पुस्तक में सेवाग्राम आश्रम से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए महात्मा गांधी के जीवन और विचारधारा पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद गांधी जी ने सेवाग्राम में अपने जीवन को सादगी, अनुशासन और निष्ठा के साथ व्यवस्थित किया। उन्होंने कहा कि राजनीति और विचारधारा अलग-अलग पहलू हैं। राजनीति समय के साथ बदल सकती है, लेकिन अच्छी विचारधारा के मूल्यों को सत्ता परिवर्तन के बाद भी आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
पुस्तक समीक्षा पैनल में महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की अध्यक्ष एवं साहित्यकार डॉ. मेघना शर्मा ने ‘कहीं से 766 किलोमीटर दूर सेवाग्राम’ अध्याय की समीक्षा की। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, गांधी जी की वैचारिक दृष्टि, आश्रम जीवन की नैतिक संरचना और आधुनिक भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि यह अध्याय गांधीवादी विरासत को केवल याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका पुनर्मूल्यांकन करने का गंभीर बौद्धिक प्रयास भी है।
डॉ. मेघना शर्मा ने सेवाग्राम आश्रम की दैनिक जीवनशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तक में भीष्म साहनी और लुई फिशर के संस्मरणों के माध्यम से सादगीपूर्ण जीवन, सीमित भोजन, व्यक्तिगत श्रम, अनुशासन और सामुदायिक जिम्मेदारी की संस्कृति को सामने लाया गया है। उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, जे.बी. कृपलानी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेताओं का सेवाग्राम पहुंचना गांधी जी के व्यापक राजनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।
साहित्यकार एवं राजकीय डूंगर महाविद्यालय में हिंदी साहित्य के आचार्य डॉ. ब्रजरतन जोशी ने पुस्तक के दूसरे खंड में साहित्य से संबंधित आलेखों की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि यह खंड साहित्य को केवल रचनाओं के सौंदर्य या लेखकों की उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि साहित्यकारों, अध्यापकों, आलोचकों, पत्रिकाओं, जीवनियों, आत्मकथाओं और पढ़ने की संस्कृति के बीच संबंधों को भी सामने लाता है। उन्होंने साहित्य को एक ऐसी सामाजिक और बौद्धिक व्यवस्था बताया, जिसके निर्माण में लेखक, संपादक, पाठक, संस्थाएं और अभिलेख महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डॉ. ब्रजरतन जोशी ने साहित्य के मूल्यांकन में प्रकाशकों, आलोचकों, पत्रिकाओं, अकादमियों और पाठक समुदाय की भूमिका पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि पुस्तक में रामचंद्र गुहा का दृष्टिकोण कई साहित्यकारों और बौद्धिक व्यक्तित्वों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण स्मरण का है। यह दृष्टिकोण साहित्यिक परंपरा को समझने में मदद करता है, हालांकि साहित्यिक प्रतिष्ठा और प्रभाव से जुड़े सवालों पर अलग-अलग दृष्टियां भी महत्वपूर्ण हैं।
सिस्टर निवेदिता कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रीतेश व्यास ने पर्यावरणविद् अनिल अग्रवाल पर आधारित अध्याय की समीक्षा करते हुए उनके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अनिल अग्रवाल ने पर्यावरण संरक्षण की बहस में गरीब और वंचित समुदायों की भूमिका को प्रमुखता से सामने रखा। चिपको आंदोलन से जुड़े अनुभवों के माध्यम से उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि पर्यावरण के जिम्मेदार प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण है।
डॉ. व्यास ने बताया कि अनिल अग्रवाल ने पर्यावरण संरक्षण, जल, जंगल, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर व्यापक अध्ययन किया। उन्होंने सुनीता नारायण और अनुपम मिश्र जैसे पर्यावरणविदों के साथ भी काम किया। अग्रवाल ने सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की स्थापना की और पर्यावरण संबंधी मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श में प्रमुखता दिलाने में योगदान दिया। उनका निधन 54 वर्ष की आयु में हो गया था।
इतिहास विषय के व्याख्याता डॉ. मुकेश हर्ष ने पुस्तक में शामिल ‘वाजपेयी की नजर में नेहरू’ आलेख पर विचार रखते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के योगदान का महत्व केवल उसके समर्थकों की प्रशंसा से नहीं, बल्कि उसके विरोधियों द्वारा किए गए मूल्यांकन से भी समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और विचारधाराओं के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन इसके कारण किसी विरोधी के योगदान को नकारना उचित नहीं है।
डॉ. मुकेश हर्ष ने कहा कि इतिहास का उद्देश्य किसी व्यक्ति को पूरी तरह महान या दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर उसके योगदान और सीमाओं को समझना है। उन्होंने वैचारिक सहिष्णुता और असहमति के अधिकार को लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषताएं बताते हुए कहा कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों को भी एक-दूसरे के योगदान का सम्मान करना चाहिए। समकालीन राजनीतिक विमर्श में यह दृष्टिकोण विशेष महत्व रखता है।
कार्यक्रम का संयोजन करते हुए संस्था के समन्वयक संजय श्रीमाली ने कहा कि पुस्तक समीक्षा जैसे आयोजनों का उद्देश्य आमजन में पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित करना और साहित्य, इतिहास तथा विचारों पर सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम लोगों को पुस्तकों के माध्यम से विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने का अवसर देते हैं।
कार्यक्रम में मधु आचार्य, गजानंद व्यास, नदीम अहमद, माणक सुथार, महेश उपाध्याय, अविनाश व्यास, आनंद पुरोहित, जाकिर अदीब, सुनीता श्रीमाली, प्रमोद शर्मा, मनन, आनंद छंगाणी, उषा बिस्सा, दीक्षा व्यास, गोपाल व्यास, प्रवीण प्रजापत, मनीष जोशी, ओमप्रकाश सुथार और इमरोज नदीम सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।


