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DM डॉक्टर इंद्रमणि त्रिपाठी ने गुरुद्वारा पहुंचकर मत्था टेका और सिख धर्म के संघर्षों को विस्तार से बताया

दीपांशु सावरन

औरैया। आज के ही दिन सिक्खों के दसवें गुरु श्री गोविंद सिंह ने सन 1699 में श्री आनंदपुर साहिब (पंजाब) में अमृत छकाकर सिक्ख पंथ की स्थापना की थी। पंज पियारो को अमृत पान कराया था। जिसका मतलब शुद्ध खालिस से है जो कि धर्म व पंथ के लिए अपना शीश दे सकते थे। जब मुगलों का अत्याचार बढ़ा व औरंगजेब की सेना हिंदू धर्म के लोगों की बहू बेटियां उठाने लगे तब गुरु गोविंद सिंह जी ने अपनी 40 लोगों की सेना बनाई व खालसा का रूप दिया। जिसमें कंघा, कच्छा, किरपाण, केश व कड़ा पहनना अनिवार्य कर दिया। जो कि खलासे की पहचान थी। मुगल सेना की शिकायत इन्हीं खालसा लोगों से की जाती थी जो कि एकत्र होकर उनका खदेड़ देते थे और उन्हें मार डालते थे। सिख समूह उसी दिन को आज भी बैसाखी के रूप में मनाता है।

जिलाधिकारी डॉक्टर इंद्रमणि त्रिपाठी ने गुरुद्वारा पहुंचकर मत्था टेका और सिख धर्म के संघर्षों को विस्तार से बताया। कहा कि कहां की सिख धर्म का संघर्ष मेरा हमेशा ही इतिहास में रहा है। पिछले कई दिनों से चल रहे गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ की समापन हुआ। उसके बाद गुरु वाणी के कीर्तन व कथा विचार हुआ और विशाल भंडारे (लंगर) का आयोजन हुआ। इस मौके पर सदर एसडीएम राकेश कुमार, नायब तहसीलदार प्रकाश चौधरी मौजूद रहे। कार्यक्रम को सफल बनाने में जगदीप सिंह चंपी, मनजीत सिंह जोहरी, गोल्डी, अमरजीत, शैलू, सोनू सब्बरवाल, हनी, रेशु, कीरत, महिंदर सिंह, मंगी सरदार, चांदी मास्टर, कालका प्रसाद, सुच्चे बाबू, संजू चड्ढा आदि लोग मौजूद रहे।

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