HomeNEWS“क्रोमैटोग्राफी: समकालीन तकनीकें एवं अनुप्रयोग” पर व्याख्यान का आयोजन

“क्रोमैटोग्राफी: समकालीन तकनीकें एवं अनुप्रयोग” पर व्याख्यान का आयोजन

दयानंद गर्ल्स पीजी कॉलेज में छात्राओं को आधुनिक क्रोमैटोग्राफिक तकनीकों की दी जानकारी, 30 छात्राओं ने किया प्रतिभाग

  • हरिओम गुप्ता

कानपुर नगर। दयानंद गर्ल्स पीजी कॉलेज, कानपुर के रसायन विज्ञान विभाग एवं आईक्यूएसी के संयुक्त तत्वावधान में “क्रोमैटोग्राफी: समकालीन तकनीकें एवं अनुप्रयोग” विषय पर ज्ञानवर्धक एवं शैक्षणिक व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन कॉलेज के कक्ष संख्या-16 में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर की रसायन विज्ञान की छात्राओं के लिए किया गया।

कार्यक्रम में ब्रह्मानंद कॉलेज, कानपुर के रसायन विज्ञान विभाग की प्रो. अलका टांगड़ी ने विशिष्ट वक्ता के रूप में छात्राओं को क्रोमैटोग्राफी के मूलभूत सिद्धांतों से लेकर आधुनिक तकनीकों और उनके विभिन्न क्षेत्रों में अनुप्रयोगों की विस्तृत जानकारी दी।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को क्रोमैटोग्राफी के आधारभूत सिद्धांतों के साथ-साथ आधुनिक एवं उन्नत क्रोमैटोग्राफिक तकनीकों से परिचित कराना रहा। साथ ही, पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने वाले सैद्धांतिक ज्ञान को आधुनिक प्रयोगशाला एवं अनुसंधान की व्यावहारिक आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास किया गया।

अपने व्याख्यान में प्रो. अलका टांगड़ी ने क्रोमैटोग्राफी के मूल सिद्धांत को सरल एवं प्रभावी तरीके से समझाया। उन्होंने बताया कि क्रोमैटोग्राफी एक महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक तकनीक है, जिसके माध्यम से विभिन्न पदार्थों को उनके स्थिर प्रावस्था (Stationary Phase) और गतिशील प्रावस्था (Mobile Phase) के बीच अलग-अलग वितरण के आधार पर पृथक किया जाता है।

उन्होंने छात्राओं को पेपर क्रोमैटोग्राफी, थिन लेयर क्रोमैटोग्राफी (TLC), कॉलम क्रोमैटोग्राफी, गैस क्रोमैटोग्राफी (GC) एवं हाई परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी (HPLC) जैसी पारंपरिक एवं आधुनिक तकनीकों के सिद्धांत, कार्यविधि और उपयोगिता के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

प्रो. टांगड़ी ने क्रोमैटोग्राफी के व्यावहारिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसका उपयोग रासायनिक उद्योग, पर्यावरण अनुसंधान, औषधि निर्माण एवं प्रदूषण की निगरानी सहित अनेक क्षेत्रों में किया जाता है। पर्यावरणीय नमूनों में मौजूद सूक्ष्म मात्रा के विषैले पदार्थों और संदूषकों की पहचान के लिए भी क्रोमैटोग्राफिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

उन्होंने बताया कि अपशिष्ट तेल में पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफेनिल (PCB) जैसे विषैले पदार्थों की सूक्ष्म मात्रा का पता लगाने तथा भूजल में DDT जैसे कीटनाशकों की पहचान में भी इन तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अलावा पेयजल की गुणवत्ता एवं वायु गुणवत्ता की निगरानी में भी क्रोमैटोग्राफी उपयोगी है।

औषधि उद्योग में क्रोमैटोग्राफी के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा कि दवा कंपनियां उच्च शुद्धता वाले उत्पादों के प्रसंस्करण तथा तैयार उत्पादों में मौजूद सूक्ष्म संदूषकों की पहचान के लिए इन तकनीकों का व्यापक उपयोग करती हैं। विशेष रूप से GC और HPLC जैसी तकनीकें विभिन्न रसायनों, तेलों और कीटनाशकों में विषैले संदूषकों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

व्याख्यान के दौरान छात्राओं ने विषय से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका वक्ता द्वारा सरल एवं वैज्ञानिक तरीके से समाधान किया गया। कार्यक्रम में कुल 30 छात्राओं ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया।

कार्यक्रम को सफल बनाने में कार्यक्रम समन्वयक प्रो. रचना प्रकाश, आयोजन सचिव डॉ. अर्चना दीक्षित, आयोजक सदस्य डॉ. प्रियदर्शनी निरंजन एवं डॉ. शैल कुमारी का विशेष सहयोग रहा।

कार्यक्रम के माध्यम से छात्राओं को क्रोमैटोग्राफी की आधुनिक तकनीकों एवं उनके व्यावहारिक अनुप्रयोगों की जानकारी प्राप्त हुई, जिससे उनके सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ अनुसंधान एवं प्रयोगशाला संबंधी समझ को भी विस्तार मिला।

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