कहा—लोकतंत्र जागरूकता से चलता है, किसी को मतदान के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
- नेहा पाठक
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश में मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक को वोट डालने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह विषय नीतिगत दायरे में आता है और इस पर फैसला लेना न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र नहीं है।
पीठ ने कहा, “लोकतंत्र कानूनी दबाव से नहीं, बल्कि जन-जागरूकता से मजबूत होता है। देश ने पिछले 75 वर्षों में लोकतंत्र के प्रति अपने विश्वास को साबित किया है। हर नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह मतदान करे, लेकिन उसे इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि जो लोग मतदान नहीं करते, उन्हें दंडित करने के बजाय जागरूक करने की आवश्यकता है।
याचिका का विवरण:
यह याचिका अजय गोयल नामक व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि जानबूझकर वोट न डालने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए और उन्हें सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि मतदान को अनिवार्य बनाने का फैसला सरकार और नीति निर्धारकों के स्तर पर ही लिया जा सकता है, न कि अदालत के आदेश से।


