HomeUttar Pradeshकिसान गोष्ठी में जैविक खेती और आय वृद्धि पर हुआ मंथन

किसान गोष्ठी में जैविक खेती और आय वृद्धि पर हुआ मंथन

एफओएम तकनीक से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण पर दिया गया जोर, 60 से अधिक किसानों ने लिया भाग

  • हरिओम गुप्ता

कानपुर नगर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र के तत्वावधान में मैथा विकास खंड के ग्राम पाण्डेय निवादा में कृषक गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का उद्देश्य फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (एफओएम) के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना, किसानों की आय में वृद्धि करना तथा पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना रहा। कार्यक्रम में 60 से अधिक किसानों ने भाग लिया।

यह गोष्ठी डॉ. खलील खान के मार्गदर्शन में संचालित परियोजना के अंतर्गत आयोजित की गई। कार्यक्रम के दौरान किसानों को किण्वित जैविक खाद (एफओएम) के महत्व एवं उपयोगिता की विस्तृत जानकारी दी गई।

विशेषज्ञों ने बताया कि एफओएम एक जैविक रूप से स्थिर खाद है, जिसे पशुओं के गोबर, धान की पराली एवं अन्य कृषि अवशेषों के सूक्ष्मजीवीय किण्वन के माध्यम से तैयार किया जाता है। यह प्रक्रिया नियंत्रित वायवीय एवं अवायवीय परिस्थितियों में संपन्न होती है, जिससे तैयार खाद मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

गोष्ठी में किसानों को बताया गया कि एफओएम के प्रयोग से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है, पौधों की जड़ों का विकास बेहतर होता है तथा पोषक तत्वों के अवशोषण की क्षमता बढ़ती है। इसके साथ ही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आती है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।

कार्यक्रम में उपस्थित किसानों ने जैविक खेती एवं पोषक तत्व प्रबंधन में एफओएम की उपयोगिता को विस्तार से समझा। विशेषज्ञों ने इसे टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि प्रणाली के लिए एक प्रभावी विकल्प बताया।

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. शशिकांत ने किसानों को पशुओं में होने वाले खुरपका-मुंहपका रोग के लक्षण, बचाव एवं प्रबंधन के संबंध में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने पशुओं के नियमित टीकाकरण एवं उचित देखभाल पर विशेष बल देते हुए किसानों को जागरूक किया।

गोष्ठी के दौरान किसानों ने विशेषज्ञों से कृषि एवं पशुपालन से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा की तथा आधुनिक एवं जैविक खेती की तकनीकों को अपनाने में रुचि दिखाई। कार्यक्रम के अंत में किसानों से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया गया।

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