ऋतु चक्र में बदलाव और पर्यावरण संकट पर कवयित्री इंदु विवेक उदैनियाँ की कविता
प्रकृति संरक्षण
पंक्तियां
#नहींबीजधरतीपरकुछतुमक्योंबोतेहो
#ऋतुचक्रपरिवर्तन
ऋतु चक्र जो बदल गया है,
क्यों रोते हो?
नहीं बीज धरती पर कुछ,
तुम क्यों बोते हो?
नदियों के रास्ते पर तुमने,
बना लिए घर।
बाढ़ें आईं, दुखी हुए तो,
आंसू भर-भर।
कंक्रीट के जंगल में,
निशदिन सोते हो।
नहीं बीज धरती पर कुछ,
तुम क्यों बोते हो?
दोष भला देते हो क्यों,
प्रकृति को सारा।
जितना हुआ, प्रकृति ने ही,
तुम्हें संवारा।
देख दुर्दशा अपनी क्यों,
साहस खोते हो।
नहीं बीज धरती पर कुछ,
तुम क्यों बोते हो?
बादल फटते, पर्वत गिरते,
देख रहे हो।
जीवन रेखा स्वयं आप ही,
मेट रहे हो।
अपने स्वार्थ-कर्म का फल,
खुद ही ढोते हो।
नहीं बीज धरती पर कुछ,
तुम क्यों बोते हो?

— इंदु विवेक उदैनियाँ
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