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विज्ञान से श्रृंगार तक: चिकित्सा ज्योतिष, एनाटॉमी और स्त्री के सोलह श्रृंगार का ऊर्जावान रहस्य। (भाग – 1)

•युग परिवर्तन और समाज में बढ़ती अतार्किक सोच के कारण भारतीय वैदिक परंपरा में शामिल कई महत्वपूर्ण धार्मिक रीति रिवाज़, संस्कार विलुप्त होने की ओर हैं। यह रीति रिवाज़, संस्कार ना केवल हिंदू सनातन संस्कृति के सदियों से पूरक हैं बल्कि वैदिक ज्योतिष में भी इन्हें पूर्ण रूप से महत्त्व दिया गया है। वर्तमान परिवेश में युगों से चले आ रहे इन नियमों व रीति रिवाज़ों का समय समय पर पालन करना आज की युवा पीढ़ी को भले ही एक बंधन, दकियानूसी तरीका लग सकता है लेकिन इन्हें अपनाने से जीवन में मानसिक स्थिरता, शारीरिक ऊर्जा के स्रोत के रूप में इनसे कितना लाभ लिया जा सकता हैं इस बारे में शायद ही आज की युवा पीढ़ी को कोई जानकारी हो। 

•हिंदू धर्म संस्कृति में महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार करने की जो रीति बनाई गई थी, शरीर के विशेष अंग पर सोना, चांदी, कांच आदि से निर्मित आभूषण पहनने के पीछे क्या वैज्ञानिक, ज्योतिषीय फायदे छिपे थे, जिनके असंख्य गुण भारतीय आयुर्वेद पद्धति, रत्न विज्ञान, तंत्र विज्ञान (एनाटॉमी) में भी बताए गए हैं, तो आज हम इन सभी वैज्ञानिक विशेषता पर इस लेख के माध्यम से विवेचना करेंगे। 

•मानव जीवन का anatomy से संबंध: एनाटॉमी, जिसे तंत्र विज्ञान कहा गया है। यह बताता है कि मानव शरीर के अंग किस तत्त्व से मिलकर बने हैं, इनका आकार क्या है और शरीर के अंदर कौनसा अंग किस भाग में स्थित हैं। इस तरह तंत्र विज्ञान सीधे तौर पर चिकित्सा ज्योतिष (medical astrology),आयुर्वेद और योग विज्ञान से जुड़ा हुआ है। 

•मानव शरीर में सात ऊर्जा चक्र और उनके प्रभाव – आयुर्वेद और चिकित्सा ज्योतिष के अनुसार, हमारे शरीर के सूक्ष्म तंत्र में सात मुख्य ऊर्जा चक्रों का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार, जब ये सातों चक्र में ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रहता है तो शरीर के सभी त्रिदोष (वात,पितृ, कफ़) और अन्तः स्रावी ग्रंथियां (Endocrine glands) ठीक से कार्य करती हैं। ये सातों चक्र हमारी रीढ़ की हड्डी के पास “नीचे से ऊपर की ओर” स्थित ऊर्जा के केंद्र हैं जो हमारे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के साथ साथ नौ ग्रहों से भी जुड़े हुए हैं। इन चक्रों के असंतुलन से ही शारीरिक, मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं। ज्योतिषीय आधार पर जब कुंडली में कोई ग्रह अशुभ स्थिति में होता है तो वह इन सातों चक्रों में से किसी भी चक्र की ऊर्जा को बाधित कर देते हैं। ज्योतिष में इन्हीं चक्रों के लिए कई उपचारात्मक विधियां शामिल की गई हैं, जिनमें रत्न, मंत्र जाप, रंग थैरेपी, ध्यान लगाना, सोलह श्रृंगार आदि प्राचीन परम्पराएँ इन्हीं चक्रों और ग्रहों को संतुलित बनाए रखती हैं। चिकित्सा ज्योतिष, रत्न विज्ञान और इन सातों चक्रों का आपस में अद्भुत संबंध हैं। मानव शरीर में स्थित यह सातों चक्र ब्रह्माण्ड की ऊर्जा और नौ ग्रहों से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक ऊर्जा चक्र का विशिष्ट रंग, योगासन, रत्न, भोजन, बीज मंत्र एवं उन पर विशेष ग्रहों का नियंत्रण होता है। जब किसी चक्र के असंतुलन होने पर कोई रत्न पहना जाता है तो वह उस रत्न की (universal cosmic rays) ब्रह्माण्डीय किरणों को शरीर में सोख लेता है और संबंधित चक्र तक पहुँचा देता है। इसी तरह जब किसी चक्र के असंतुलन होने पर उसके विशेष मंत्र जाप किए जाते हैं तो स्वर यंत्र या ग्रंथि सक्रिय (active) होकर संबंधित चक्र की बिगड़ी हुई ऊर्जा को पुनः जागृत करने लगती है। 

•इन सातों चक्रों के नाम, रंग थैरेपी, रत्न विज्ञान और ज्योतिषीय संबंध–

1- मूलाधार चक्र (Root chakra) : रीढ़ की हड्डी का सबसे निचला छोर (गुदा और लिंग के बीच adrenal glands) अधिवृक्क ग्रंथि। इसके असंतुलन होने पर जीवन ऊर्जा क्षीण (low vitallity), असुरक्षा की भावना, डर, पैरों और हड्डियों में दर्द। यहां मंगल और शनि ग्रह का नियंत्रण होता है। इस चक्र का मुख्य भोज्य पदार्थ लाल रंग है, लाल सेब, अनार, प्रोटीन, खनिजों से युक्त भोजन, साबुत अनाज। “लं” बीज मंत्र, रत्न मूंगा, मुख्य योग क्रिया मलासन और वीरभद्र योगासन।

2- स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral chakra): त्रिकास्थि स्थान।

नाभि से ठीक नीचे जननांग का स्थान (Reproductive organs), असंतुलन होने पर रचनात्मकता की कमी, प्रजनन क्षमता एवं पैल्विक भाग प्रभावित, गुर्दे, तरल पदार्थ, अवसादित मन, पीठ के निचले भाग में दर्द, हॉर्मोनल असंतुलन। यहां शुक्र, चन्द्रमा का नियंत्रण होता है। रत्न मोती, ओपल, हीरा। इस चक्र का मुख्य भोजन सफेद पदार्थ, दूध, संतरा किन्नू, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, नारंगी रंग के फल। “वं” बीज मंत्र और मुख्य योगासन बुद्धकोणासन और भुजंगासन है।

3- मणिपुर चक्र (Manipura-solar plexus chakra) : नाभि के ठीक ऊपर(पेट का ऊपरी हिस्सा) का भाग। यह शरीर में अग्नि तत्व का केंद्र है। इसके असंतुलन होने पर आत्मविश्वास की कमी (low willpower), खराब अग्नाश्य (pancreas) और मेटाबॉलिज्म, कमज़ोर मांसपेशियाँ, खराब पाचन तंत्र, जीवन में कमजोर नेतृत्व, अत्यधिक क्रोध और चिड़चिड़ापन। यहां सूर्य, मंगल ग्रह का नियंत्रण होता है। रत्न माणिक्य। इस चक्र का मुख्य भोजन पीले रंग के भोज्य पदार्थ हल्दी, केला, पीली शिमला मिर्च, मक्का, अनानास और पपीता, अदरक, ज़ीरा और अजवाइन का सेवन करना, धूप में बैठकर सूर्य की ऊर्जा लेना। बीज मंत्र “रं” और मुख्य योगासन नवासन और धनुरासन हैं।

4- अनाहत चक्र (heart chakra): छाती का मध्य भाग (हृदय के पास का क्षेत्र), इसके असंतुलन होने पर थाइमस ग्रंथि (thymus gland) प्रभावित, ऑक्सीजन की कमी, फेफड़े, भावनात्मक अकेलापन, हमेशा आहत होते रहना, रिश्तों में मनमुटाव, सीने में भारीपन/जकड़न, हृदय क्षेत्र में ऊर्जा की कमी, अस्थिरता, मानसिक अस्पष्टता, प्रेम/करुणा, संवेदना की कमी। रत्न हीरा,पन्ना। यहां शुक्र, चन्द्रमा और बुध ग्रहों का नियंत्रण है। रत्न हीरा, पन्ना। मुख्य भोजन हरे रंग की फल सब्ज़ियां, कद्दू और सूरजमुखी के बीज, प्रकृति के बीच समय बिताना, क्षमा और प्रेम का भाव रखना। बीज मंत्र “यं” और मुख्य योगासन उष्ट्रासन और गोमुखासन है।

5- विशुद्धि चक्र (Throat Chakra): गले का निचला भाग (कंठ क्षेत्र), इसके असंतुलन होने पर हकलाहट, बोलने में झिझक,थाइरॉयड, ज्ञान और एकाग्रता का अभाव, वाणी, संवाद, गले और स्वर से जुड़ी सभी समस्याएं।  यहां बुध और बृहस्पति ग्रह का नियंत्रण है। रत्न पन्ना या पुखराज। मुख्य भोजन गले की सफाई के लिए गर्म पानी पीना, मौन व्रत रखना, मुलेठी,अदरक, शहद की चाय, नारियल पानी,जलयुक्त फल। बीज मंत्र “हं” का जाप, मुख्य योगासन सर्वांगासन और मत्स्यासन है।

6- आज्ञा चक्र (Third eye chakra, ajna): दोनों भौहों के मध्य माथे का केंद्र। इसके असंतुलन होने पर पीयूष ग्रंथि (pituitary gland), आँखें, अंतर्दृष्टि,(intuition power) मस्तिष्क शक्ति, एकाग्रता की कमी, सिरदर्द, निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। यहां सूर्य और चंद्रमा का नियंत्रण है। रत्न नीला नीलम या लैपिस लाजोली (लाजवृत), मुख्य भोजन नीले, बैंगनी फल व सब्ज़ी, ब्राह्मी और अश्वगंधा, अखरोट, अलसी,बादाम का सेवन। बीज मंत्र “ॐ” का जाप, नियमित रूप से ध्यान लगाना, माथे पर चंदन या लाल कुमकुम लगाना। मुख्य योगासन बालासन और प्रजोत्तानासन है।

7- सहस्रार चक्र (Crown chakra): सिर का सबसे ऊपरी भाग चोटी का स्थान, सर्वोच्च चेतना से जुड़ने पर यह चक्र मदद करता है। इसके असंतुलन होने पर मानसिक शांति और आध्यात्मिक दृष्टिकोण भंग हो जाता है। जीवन में उद्देश्यहीनता की भावना, तनाव की वृद्धि, जीवन की प्राण ऊर्जा में कमी होने लगती है। यहां बृहस्पति और केतु ग्रह का नियंत्रण है। मुख्य भोजन सात्विक आहार, उपवास रखना, सभी तरह के फल सब्ज़ियां, हल्का भोजन। प्राकृतिक वातावरण में निवास, बिना शब्द के मौन साधना करना। रत्न एमेथिस्ट, क्लियर क्वार्ट्ज, सेलेनाइट। लंबी सांस भरते हुए बीज मंत्र ॐ का धीमे स्वर से जाप। मुख्य योगासन पद्मासन और सुखासन हैं।

•इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों का मूल स्थान– मूलाधार चक्र (Root Chakra) इन तीनों नाड़ियों का उद्गम और समापन मूलाधार चक्र और सहस्रार चक्र के बीच होता है।

मूलाधार चक्र (रीढ़ का निचला छोर) वह आधार है जहाँ से ये नाड़ियाँ ऊपर की ओर उठती हैं और आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के मध्य) पर जाकर आपस में मिलती हैं। इड़ा मानसिक और शीतलता प्रदान करने वाली ऊर्जा है। पिंगला शारीरिक और उष्णता प्रदान करने वाली ऊर्जा है और सुषुम्ना इन दोनों का संतुलन करते हुए मनुष्य को भौतिक चेतना से निकालकर आध्यात्मिक चेतना की ओर ले जाती है।

✓इस लेख के अगले भाग 2 में आप पढ़ेंगे सोलह श्रृंगार के सम्बन्ध के बारे में।

[नोट: लेख में किसी भी प्रकार का प्रयोग, योगासन आदि करने की सलाह नहीं दी गई है। किसी भी प्रकार का प्रयोग करने से पूर्व संबंधित विशेषज्ञ का मार्गदर्शन अवश्य लें।]

ज्योतिर्विद् अशनिका शर्मा 

मेरठ, उत्तर प्रदेश।

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