मुझे दिल में बसाते क्यों नहीं हो
मुझे दिल में बसाते क्यों नहीं हो,
मोहब्बत है, जताते क्यों नहीं हो।।
मेरे ख़्वाबों में आते रोज़ हो तुम,
मगर पर्दा हटाते क्यों नहीं हो।।
तुम्हारी याद से रोशन हैं रातें,
ये रिश्ता फिर निभाते क्यों नहीं हो।।
मेरे दिल की सदा सुनते हो लेकिन,
कभी होंठों पे लाते क्यों नहीं हो।।
छुपाए बैठे हो जो बात दिल में,
उसे खुलकर बताते क्यों नहीं हो।।
मोहब्बत जुर्म तो हरगिज़ नहीं है,
ये दुनिया को बताते क्यों नहीं हो।।
“शिखा” दिल कब से मेरा मुन्तज़िर है,
क़रीब आकर मनाते क्यों नहीं हो।।
— डॉ. शिखा दीप्ति दीक्षित



