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हृदय की संवेदना से ….

हृदय की संवेदना से….

स्वचिंतन से हर राह निकलती 

कभी तो इसे आजमाया करो 

कहानियाँ यूँही न सुनाया करो ,

सुख दुख की बदली ये जीवन 

हार मान यूँ, न बैठ जाया करो 

कभी खुद से प्यार जताया करो 

जब तक कोई , अंतर्मन न छूले 

उसे भेद सारे ,न तुम बताया करो ।।

दिल दिमाग से, एकाग्रचित होकर ,

अपनी उलझने खुद सुलझाया करो।

नहीं किसी के विश्वास के ऊपर ही 

यूँही न अपना विश्वास जताया करो

जब तक कोई ,मन में न समा जाए

तब तक तुम न मन की बताया करो

ये दुनियाँ का खेल हैं अजब निराला 

तुम धोखा न किसी से यूँ खाया करो

खुद को इतना तुम , मजबूत बना लो 

हृदय संवेदनाओं से खुद पार पाया करो ।।

~ आशी प्रतिभा ( स्वरचित)

मध्य प्रदेश, ग्वालियर 

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