तोहफ़े में दे गया था वो इक रात चूड़ियाँ,
सबको बता रही हैं मेरी बात चूड़ियाँ।
होंठों पे ख़ामोशी है मगर दिल में दर्द है,
करती हैं मेरे साथ अजब घात चूड़ियाँ।
सबकी ही कलाई में खनकती हैं बराबर,
मज़हब न जाने और न ही जात चूड़ियाँ।
सावन की रुत में गूँजती हैं याद बन के ये,
देती हैं मुझको इश्क़ की सौगात चूड़ियाँ।
मैं जिसका ख़्वाब देखती रहती थी रात-दिन,
करती हैं अब उसी से मुलाक़ात चूड़ियाँ।
वो सामने नहीं है मगर ये गुमान है,
करती तो होंगी उससे ख़ुराफ़ात चूड़ियाँ।
मेहँदी का रंग हाथ से कब का उतर गया,
रखती हैं दिल में अब भी वही घात चूड़ियाँ।
तन्हाइयों की धूप में जलते हुए बदन,
करती हैं खूब याद की बरसात चूड़ियाँ।
आया न लौटकर वो मेरे इंतज़ार में,
लाएँ कहाँ से अब कोई बारात चूड़ियाँ।
इक शख़्स की जुदाई ने ऐसा बदल दिया,
सहती हैं रोज़ ग़म की नई मात चूड़ियाँ।
वो छोड़कर गया तो मैं मायूस हो गई,
हर रोज़ टूटती हैं मेरे साथ चूड़ियाँ।



