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हमने पाई है परिधि ….. उस शून्यता कीजिसने करवाया है हमको आत्मपरिचय ……..

मने पाई है परिधि …..उस शून्यता की
जिसने करवाया है हमको आत्मपरिचय
मन न चल पाया जगत की रीतियों संग
और इसने आजतक सीखा न अभिनय
बंद पट कर चक्षुओं ने ध्यान से जब
मन में देखा एक सागर को उमड़ते
सप्तरंगी एक उपवन भी सजा था
बादलों के रथ भी आकर थे उतरते
यूॅं हृदय भीतर नया संसार पाकर
हमने ठुकराए जगत के खीझते स्वर
मन में उमड़े अश्रुओं ने कर लिया फिर
चक्षुओं की देहरी संग नेह -परिणय
मन न चल पाया जगत की रीतियों संग
और इसने आजतक सीखा न अभिनय
दूर कोलाहल से बैठे हैं जगत के
भावनाओं के भॅंवर को ताकते हैं
ये नयन हमको दिखाते क्या है दुनिया
देखते बाहर ,न भीतर झाॅंकते हैं
बन के मन का दास हमने जी लिया है
कामनाओं का ये विष भी पी लिया है
राग सारे छोड़कर जब चल पड़े तो
शेष जीवन ही बना जाता है मधुमय
मन न चल पाया जगत की रीतियों संग
और इसने आजतक सीखा न अभिनय

-पूजा मिश्रा यक्ष
(प्रत्येक कविमन को समर्पित मेरा ये गीत)

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