जो भी हों हालात, निभाना पड़ता है,
आँखों से भी अश्क बहाना पड़ता है।
प्यार-मोहब्बत बच्चों का तो खेल नहीं,
पागलपन की हद तक जाना पड़ता है।
इश्क़-ओ-मोहब्बत करके मैंने देख लिया,
अपना सब कुछ यार लुटाना पड़ता है।
लौट के वो परदेस से आने वाले हैं,
उनकी ख़ातिर घर को सजाना पड़ता है।
रस्म-ए-दुनिया यूँ भी निभानी पड़ती है,
दर्द-ए-जुदाई हँस के छुपाना पड़ता है।
राह-ए-वफ़ा में फूल भी हैं और काँटे भी,
दोनों का ही साथ निभाना पड़ता है।
उनको बता के और भी दुख बढ़ जाता है,
अपने ग़म को दिल में दबाना पड़ता है।
जिसको दिल से चाहो, अपना मान लो तुम,
उसकी ख़ातिर ख़ुद को मिटाना पड़ता है।
उनका क्या है, वो तो मुझे आवाज़ दें,
मुझको अक्सर दौड़ के जाना पड़ता है।
ये तो ‘शिखा’ की मजबूरी है, शौक़ नहीं,
बहरों को भी शेर सुनाना पड़ता है।



